आपकी मुसीबतों के लिए माता पिता, बिल्ली, मौसम नहीं आपका नकारात्मक व्यवहार जिम्मेदार है

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आपकी ज़िन्दगी आज जो भी है, वो अपने ही बनाई है, चाहे आप मानो या ना मानो ये आप ही के द्वारा सजायी जाती है. आखिरकार आप ही खुशियाँ चुनते हैं. आप दुःख चुनते हैं. निश्चितता, अनिश्चितता, सफलता, असफलता सभी आप ही चुनते हैं. आप साहस चुनते हैं. आप डर चुनते हैं. इतना याद रखिये कि हर एक क्षण, हर एक परिस्थिति आपको एक नया विकल्प देती है. और ऐसे में आपके पास हमेशा ये अवसर होता है कि आप चीजों को अलग तरीके से करें.

हम अगर अपनी जिंदगी में कुछ करना चाहते है कुछ बनाना चाहते है तो सबसे पहले आपको प्रोएक्टिव बनाना होगा

Proactive होने का मतलब है कि अपनी जिंदगी के लिए खुद ज़िम्मेदार बनना. आप हर चीज के लिए अपने माता पिता या दादा को दोषी नहीं बना सकते. प्रोएक्टिव लोग इस बात को समझते हैं कि अपनी जिंदगी के लिए वो खुद ही ज़िम्मेदार है, वो अपने आचरण के लिए जेनेटिक्स, परिस्थितियों, या परिवेष को दोष नहीं देते हैं. उन्हें पता होता है कि वो अपना व्यवहार खुद चुनते हैं.

दूसरी तरफ जो लोग reactive यानी प्रतिक्रियाशील होते हैं वो ज्यादातर अपने भौतिक वातावरण से प्रभावित होते हैं. वो लोग अपने जीवन की हर गलती के लिए बाहरी चीजों को दोष देते हैं. जैसे अगर मौसम अच्छा है, तो उन्हें अच्छा लगता है. और अगर नहीं है, तो यह उनके रवैये और गतिविधियो में परिवर्तन आ जाता है. वो मौसम को दोष देते हैं, अगर इन लोगो का कोई काम नहीं होता तो इसके लिए मौसम, पडोसी, बिल्ली या कोई भी जिम्मेदार हो सकता है, इन लोगो की सबसे बड़ी खासियत ये होती है की ये अपनी गलती कभी नहीं मानते.

सभी बाहरी ताकतें एक उत्तेजना की तरह काम करती हैं, जिन पर हम प्रतिक्रिया करते हैं. इसी उत्तेजना और आप उस पर जो प्रतिक्रिया करते हैं के बीच में आपकी सबसे बड़ी ताकत छिपी होती है, और वो होती है इस बात कि स्वतंत्रता कि आप अपनी प्रतिक्रिया का चयन स्वयम कर सकते हैं. एक बेहद महत्त्वपूर्ण चीज होती है कि आप इस बात का चुनाव कर सकते हैं कि आप क्या बोलते हैं. आप जो भाषा प्रयोग करते हैं, वो इस बात को बताती है की आप खुद को कैसे देखते हैं. हर बार पर प्रतिक्रिया करना कोई जरुरी नहीं होता, कभी अगर हम अपने आप को शांत कर लेते है तो 90% समस्या आपने आप समाप्त हो जाती है. कई बार हम बोलते चले जाते है और ये भी याद नहीं होता की क्या बोल रहे है और क्यों बोल रहे है. ये 90% समस्या वो जो हम अपनी भाषा के गलत इस्तेमाल के कारण पैदा करते है, जैसे छोटी छोटी बातो पर लड़ाई करना और भद्दी भाषा का प्रयोग करना ये सब हमारे अंदर के नकारत्मक और प्रतिक्रियाशील व्यक्तिव को देखता है.

आपके दुवारा बोली गयी भाषा बहुत कुछ बात देती है की आप किस तरह के इंसान है और साथ ही आपकी नकरत्मता भी

एक सकारत्मक व्यक्ति सकारत्मक भाषा का प्रयोग करता है. मैं कर सकता हूँ, मैं करूँगा. एक नकारत्मक व्यक्ति नकारत्मक भाषा का प्रयोग करता है, मैं नहीं कर सकता, काश अगर ऐसा होता

नकारत्मक और प्रतिक्रियाशील व्यक्ति लोग सोचते हैं कि वो जो कहते और करते हैं उसके लिए वो खुद जिम्मेदार नहीं हैं, उनके पास कोई विकल्प नहीं है.

ऐसी परिस्थितियां जिन पर बिलकुल भी नहीं या थोड़ा-बहुत नियंत्रण किया जा सकता है, उस पर कोई प्रतिक्रिया या चिंता करने के बजाये सकारत्मक लोग अपना समय और ऊर्जा ऐसी चीजों में लगाते हैं जिनको वो नियंत्रण कर सकें. हमारे सामने जो भी समस्याएं, चुनौतियां या अवसर होते हैं उन्हें हम दो क्षेत्रों में बाँट सकते हैं:

1. चिंता का क्षेत्र
2. प्रभाव का क्षेत्र

जो लोग अपनी जिम्मेदारी खुद लेते है वो लोग अपना प्रयत्न प्रभाव का क्षेत्र पर केन्द्रित करते हैं. वो ऐसी चीजों पर काम करते हैं जिनके बारे में वो कुछ कर सकते हैं: स्वास्थ्य, बच्चे, कार्य क्षेत्र कि समस्याएं.

और जो लोग अपने जीवन ने कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते और हर बात के लिए बाहरी लोगो या वातावरण को ज़िम्मेदार मानते है वो लोग अपना प्रयत्न पर चिंता के क्षेत्र में केन्द्रित करते हैं जैसे देश पर ऋण, पडोसी, मौसम, या कुछ भी जो इन लोगो को संतुष्ट करदे और आप अपनी जिम्मेदारी से बच जाये.