उपेंद्र कुशवाहा अलग हुए तो बीजेपी-जेडीयू का कितना बिगाड़ लेंगे?

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केंद्रीय राज्यमंत्री और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा आजकल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमलावर हैं। राज्य में शिक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर वह पहले भी नीतीश सरकार पर बरसते रहे हैं लेकिन इस बार मामला आगामी लोकसभा चुनाव में सीटें मिलने और नीतीश की एक कथित टिप्पणी से भी जुड़ा हुआ है।

सबकी कुर्बानी वाले फॉर्मूले के तहत सिर्फ दो सीटों की चर्चाओं से कुशवाहा नाराज हैं और आजकल बिहार में लगातार उनके कार्यक्रम चल रहे हैं जिसमें 10 नवंबर को नीतीश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान उनके समर्थकों को पुलिस की लाठी भी खानी पड़ी। सवाल उठता है कि क्या उपेंद्र कुशवाहा का दबाव काम आएगा और उनकी सीटें बढ़ सकती हैं, या फिर वो एनडीए से अलग हो ही गए तो नीतीश और बीजेपी का क्या बिगाड़ सकते हैं?

2014 के लोकसभा चुनावों की तो कुशवाहा की पार्टी मिली हुई तीनों सीटों पर जीत कर सौ फीसदी प्रदर्शन करने वाली पार्टी रही थी और सहयोगी एलजेपी और बीजेपी दोनों से आगे रही थी। 2015 के विधानसभा चुनावों में भी आरएलएसपी का प्रदर्शन एलजेपी और जीतनराम मांझी की पार्टी से अच्छा ही रहा था, बावजूद इसके कि सीट आवंटन के वक्त सबसे ज्यादा समझौता कुशवाहा को ही करना पड़ा था।

बिहार एनडीए में कुशवाहा मजबूत हो रहे थे कि नीतीश कुमार की भी एंट्री हो गई। कुशवाहा की परेशानी यहां से शुरू हो गई क्योंकि वह जिस कुशवाहा समाज को आगे रख कर राजनीति करते हैं वह नीतीश कुमार का भी आधार वोटर है, साथ ही कुर्मी समाज तो उनके साथ है ही। नीतीश के साथ आने के बाद संभवत: बीजेपी भी मान बैठी है कि अब कुशवाहा ज्यादा प्रभावी नहीं।

लेकिन बिहार की हाल की सियासत पर नजर डाली जाए तो हाल के कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिनसे कोइरी समाज नीतीश कुमार से नाराज है और उपेंद्र कुशवाहा के साथ खड़ा हो रहा है। सबसे ताजा मामला बेगूसराय के पोखरिया का है जहां कुशवाहा छात्रावास के 4 युवकों के साथ दबंगों ने दरिंदगी की और पुलिस लापरवाह दिखाई दी।

नीतीश कुमार पर आरोप यह भी लगता है कि उनकी पार्टी में किसी भी कुशवाहा नेता को पनपने-आगे बढ़ने नहीं दिया गया, ऐसे नेताओं में खुद उपेंद्र कुशवाहा भी हैं जो एक वक्त नीतीश के साथ और समकक्ष ही रहे। 2005 में नेता विपक्ष उपेंद्र कुशवाहा ही थे, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश बने थे। इनके अलावा नीतीश कैबिनेट में ही मंत्री रही मंजू वर्मा, एमएल चौधरी, अवधेश कुशवाहा जैसे कई कुशवाहा नेताओं की राजनीति अलग-अलग वजहों और आरोपों से संकट में आ गई। आरोपों में सच्चाई जो भी हो लेकिन कुशवाहा समाज को लगता है कि इन नेताओं को फंसाया गया।

नीतीश से नाराज कुशवाहा समाज उपेंद्र कुशवाहा में संभावनाएं देख रहा है, इसीलिए आरएलएसपी हाल के वर्षों में मजबूत दिखती है और उसके कार्यक्रमों में भीड़ भी बढ़ रही है। बिहार में लव-कुश समाज यानी कुर्मी और कोइरी जातियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा तो नहीं है लेकिन माना जाता है कि कुर्मियों की संख्या 2-3 फीसदी और कोइरी की संख्या 5-6 फीसदी के करीब है, यह एकजुट होकर समर्थन करें तो हवा का रुख मोड़ सकते हैं। यह वर्ग उपेंद्र कुशवाहा को ताकत दे रहा है और यही वजह है कि कुशवाहा अपनी लड़ाई को और तेज करते जा रहे हैं, उधर दो-तीन दिनों में ही सीट बंटवारे का ऐलान करने वाली बीजेपी अब तक फैसला नहीं ले पाई है, तो नीतीश की जेडीयू भी कुशवाहा के मामले में चुप रहना ही बेहतर मानती है।