ज्यादा बिजली के साथ, महंगी बिजली के लिए रहे तैयार, ग्रामीणों को अब मामूली दर पर बिजली नहीं मिलेगी

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प्रदेशवासियों को ज्यादा बिजली के साथ ही अब महंगी बिजली के लिए तैयार रहना चाहिए। ग्रामीणों को अब मामूली दर पर बिजली नहीं मिलेगी। शहर की तरह गांव में बिजली आपूर्ति के घंटे बढ़ाने के बाद पावर कारपोरेशन प्रबंधन बिजली की दरों में अंतर को घटाने के लिए गांव की बिजली दर को कहीं ज्यादा बढ़ाने की कवायद कर रहा है। प्रबंधन, बिजली की दर बढ़ाने संबंधी प्रस्ताव जल्द ही विद्युत नियामक आयोग में दाखिल करेगा।

दरअसल, वोट की राजनीति के चलते सूबे में विभिन्न श्रेणियों के उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति के घंटे तो बढ़ते जा रहे हैं लेकिन, बिजली की दरों में जमीन-आसमान जैसा अंतर है। ऐसे में बिजली आपूर्ति की लागत बढ़ते जाने के बावजूद गांव में मामूली दर पर बिजली देने का बोझ न केवल शहरवासियों को उठाना पड़ रहा है बल्कि वाणिज्यिक व उद्योगों की बढ़ती बिजली दर, व्यापारियों और उद्यमियों की भी कमर तोड़ रही है। प्रमुख सचिव ऊर्जा के साथ ही कारपोरेशन के अध्यक्ष आलोक कुमार का कहना है कि बिजली आपूर्ति के घंटे बढ़ाने के साथ ही कारपोरेशन को चलाने के लिए न केवल मौजूदा बिजली दरों में इजाफा करना होगा बल्कि विभिन्न श्रेणियों की बिजली दरों में अंतर को घटाने के लिए उन्हें तार्किक भी बनाना होगा।

कुमार बताते हैं कि 18 से 24 घंटे बिजली देने के लिए प्रतिमाह चार हजार करोड़ रुपये की बिजली खरीदी जा रही है जबकि वसूली तकरीबन 3200 करोड़ रुपये की ही है। ऐसे में प्रतिमाह 800 करोड़ रुपये घाटा बढ़ता जा रहा है जिससे कारपोरेशन को बहुत दिन चलाना संभव नहीं है। बिजली खरीद का भुगतान न होने से उत्पादक कंपनियां बिजली आपूर्ति बंद करने की लगातार नोटिस दे रही हैं।

प्रदेशवासियों को बिजली आपूर्ति करने पर पावर कारपोरेशन को जहां पिछले वर्ष 6.35 रुपये प्रति यूनिट खर्च करने पड़ रहे थे वहीं लागत बढऩे से अब 7.22 रुपये प्रति यूनिट खर्च आ रहा है। इसमें बिजली खरीद तो 4.25 रुपये यूनिट है लेकिन, 23.4 फीसद लाइन हानियों (बिजली चोरी आदि से) से बिजली 5.55 रुपये यूनिट हो जा रही है। ब्याज व अन्य खर्चों से दर बढ़कर 7.22 रुपये यूनिट पहुंच जा रही है जबकि विभिन्न श्रेणियों की मौजूदा बिजली दर से औसतन 5.14 रुपये यूनिट ही कारपोरेशन को हासिल हो रहे है। ऐसे में प्रति यूनिट गैप या घाटा लगभग 2.08 रुपये है।

बिजली वही लेकिन, सूबे में किसानों (कृषि उपभोक्ताओं) को जहां मात्र 78 पैसे प्रति यूनिट मिल रही है वहीं लघु व मध्यम उद्योगों को 8.44 रुपये प्रति यूनिट पड़ रही है। यही नहीं गांव में रहने वालों को 2.17 रुपये जबकि शहरी घरेलू उपभोक्ताओं को लगभग तीन गुना अधिक 6.15 रुपये प्रति यूनिट की दर से मिल रही है। शहरी लाइफ लाइन उपभोक्ताओं को भी 3.47 रुपये प्रति यूनिट ही चुकाना पड़ रहा है। आलोक कुमार के मुताबिक इन 56 फीसद उपभोक्ताओं से प्रति यूनिट एक से 6.50 रुपये का नुकसान हो रहा है।

सर्वाधिक नुकसान 12 फीसद अनमीटर्ड कृषि उपभोक्ताओं से ही हो रहा है। गांव के 21 फीसद उपभोक्ताओं से 5.05 जबकि शहर के 21 फीसद घरेलू उपभोक्ताओं से 1.07 रुपये प्रति यूनिट हानि ही रही है। दूसरी तरफ 7.2 व्यापारियों को 7.64 व 13.63 फीसद बड़े उद्योगों को 7.49 रुपये यूनिट बिजली मिल रही है जिससे क्रमश: 42 पैसे व 27 पैसे यूनिट जबकि 4 फीसद लघु उद्योग से 1.22 रुपये यूनिट का फायदा हो रहा है। चूंकि लागत से कम दर पर बिजली पाने वाले यहां अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है इसलिए कारपोरेशन का घाटा बढ़ता जा रहा है।

उद्योगों की और नहीं बढ़ेगी दर कारपोरेशन के अध्यक्ष आलोक कुमार ने बताया कि दरों को तार्किक बनाने के लिए शहरी व गांव की दरों में अंतर कम किया जाएगा। ऐसे में गांव की बिजली दर को कहीं ज्यादा बढ़ाया जाएगा जबकि शहरी क्षेत्र की दरों में मामूली इजाफा ही किया जा सकता है। कुमार का मानना है कि उद्योगों की बिजली दर में इजाफा करने की गुंजायश अब न के बराबर है। दर बढऩे पर उद्योग दूसरे राज्य में पलायन कर सकते हैं जिससे प्रदेश का विकास प्रभावित होने के साथ ही रोजगार के अवसर भी कम होंगे।

source-DJ