उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की पीसीएस समेत नौ हजार पद सीबीआइ जांच के दायरे में

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उप्र लोकसेवा आयोग (यूपी पीएससी) की सीबीआइ जांच में सबसे अहम परीक्षा पीसीएस समेत नौ हजार से अधिक पद दायरे में आएंगे। भाजपा सरकार ने भले ही सपा शासनकाल में 2012 से लेकर 2017 तक की भर्तियों की जांच कराने का एलान किया है लेकिन, इस अवधि में 2011 की भी कई परीक्षाएं हुई हैं। इसलिए उनकी भी जांच होगी, क्योंकि लगभग सभी भर्तियों में कोई न कोई विवाद रहा है। यूपी पीएससी की भर्तियों की जांच के एलान के बाद से यह आकलन शुरू हो गया है कि उसका असर कितना होगा।

आयोग की सबसे अहम परीक्षा पीसीएस के ही 3127 पद इस दायरे में आ रहे हैं। इनमें 178 अभ्यर्थियों का चयन एसडीएम और 184 का डिप्टी एसपी पद पर चयन हुआ है। ऐसे ही सम्मिलित अवर अधीनस्थ यानी लोअर सबार्डिनेट के 4190 पद, समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी के 2057 की भी जांच होगी। पीसीएस 2014, लोअर 2013, समीक्षा अधिकारी 2013 का परिणाम केवल अनुक्रमांक के आधार पर आयोग ने जारी किया था।

जिसमें पीसीएस के 579 पद, लोअर के 1545 पद, समीक्षा अधिकारी के 505 पद रहे हैं। 2013 व 2014 के अलावा हुई भर्तियों से भी विवाद जुड़ा रहा है। पीसीएस 2011 में त्रिस्तरीय आरक्षण तथा जाति विशेष को स्केलिंग में अधिक अंक देना, पीसीएस 2012 व 2013 के अंतिम परिणाम में सफल अभ्यर्थियों के नाम के आगे जाति/वर्ग का उल्लेख न करना तथा ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) व्यवस्था लागू किया गया।

इसी तरह पीसीएस 2014 के अंतिम परिणाम में नाम/जाति/वर्ग का उल्लेख नहीं किया गया। पीसीएस 2015 और 2016 के प्रश्नों के गलत उत्तर का प्रकरण अब तक अनसुलझा है। पीसीएस 2015 की प्रारंभिक परीक्षा का प्रश्नपत्र पहली बार लीक हुआ। इनमें से पीसीएस 2011, 2014, 2015 व 2016 की अनियमितता का मामला अब भी न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे ही लोअर सबार्डिनेट 2004-06 के विशेष चयन में एक जाति विशेष के अभ्यर्थियों का चयन करने का आरोप है तो लोअर सबार्डिनेट 2008 व 2009 की मुख्य परीक्षा में ही इलाहाबाद के लगभग सभी अभ्यर्थी अप्रत्याशित रूप से असफल घोषित कर दिए गए।

इसका परिणाम आने पर इलाहाबाद में जमकर बवाल भी हुआ था। वहीं, लोअर सबार्डिनेट 2013 में प्रश्नों के गलत उत्तर के कारण मामला न्यायालय में विचाराधीन तथा अंतिम परिणाम में सफल अभ्यर्थियों का नाम मांग के बाद भी घोषित नहीं किया गया। लोअर सबार्डिनेट 2015 में भी प्रश्नों के गलत उत्तर का प्रकरण न्यायालय में लंबित है।

आयोग की समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी विशेष चयन 2010 में एक खास जाति के अभ्यर्थियों को चयनित करने का आरोप लगा। समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी 2013 के प्रश्नों के गलत उत्तर रखने के कारण तत्कालीन आयोग अध्यक्ष अनिल यादव को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से तलब किया गया। इसके बाद भी परिणाम का बिना नाम के अंतिम परिणाम जारी किया गया। समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी 2014 के प्रश्नों के गलत उत्तर व समीक्षा अधिकारी/सहायक समीक्षा अधिकारी 2016 का पेपर लीक हो जाने के कारण यह परीक्षाएं विवाद में हैं।

source-DJ