नोटबंदी, ट्रिपल तलाक जैसे कई कारण बने मोदी के होली में रंग

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प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने ‘जाति राजनीति’ को सत्ता से बाहर कर दिया। नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल खड़े करने वालों को देश विरोधी करार दिया। नोटबंदी को ग्रामीणों और शहरी गरीबों ने काफी पॉजिटिव लिया। उन्हें मैसेज गया कि अमीर-गरीब बराबर हैं, जिससे अति पिछड़े और दलित प्रभाव वाली 100 सीटें बीजेपी की झोली में आ गईं। वहीं, मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक का खुलकर सपोर्ट किया और उनके वोट बीजेपी को मिले। यहां तक कि 43% मुस्लिम आबादी वाले देवबंद में भी उन्होंने बीजेपी को जिता दिया|

1. ध्रुवीकरण:बसपा ने मुस्लिम-दलित और सपा ने मुस्लिम-यादव की सोशल इंजीनियरिंग को जीत का फॉर्मूला समझा। मायावती ने हर रैली में कहा कि 100 मुस्लिमों को टिकट दिए। जबकि सपा कहती रही कि मुस्लिम वोट के लिए कांग्रेस का साथ लिया। बीजेपी ने अगड़े, गैर-यादव ओबीसी और दलित वोट बैंक पर फोकस किया। 150 गैर-यादव ओबीसी कैंडिडेट्स उतारे। पटेल, राजभर, कुर्मी की राजनीति करने वाली पार्टियों अपना दल और सुहेलदेव समाज पार्टी से गठबंधन किया। एक भी मुस्लिम को टिकट न देकर हिंदू वोटरों को अपना संदेश दिया। मोदी का कब्रिस्तान-श्मशान वाला बयान भी इसी रणनीति का हिस्सा था।
क्या हुआ: 10% से अधिक दलित वोट बीजेपी को मिले। ओबीसी के 30% वोट मिले।
2. ट्रिपल तलाक: भाजपा ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया। सपा, बसपा, कांग्रेस चुप रहे। यही चुप्पी मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी के करीब ले गई।
क्या हुआ: बीजेपी को 15% मुस्लिम महिलाओं ने वोट दिए। बीजेपी ने मुस्लिम बहुल 124 सीटों (20%+मुस्लिम) में से 99 सीट जीती।
3.मोदी का आक्रामक चुनाव प्रचार: मोदी ने 21 रैलियां की। 130 सीटों तक पहुंचे। अाखिरी फेज में तीन दिन बनारस में रहे। तय एजेंडे के तहत अखिलेश पर भेदभाव का आरोप लगाया।
क्या हुआ:अखिलेश पूरे चुनाव प्रचार में सफाई देते रहे। मोदी जिन 130 सीट तक पहुंचे उनमें से 90% जीत लीं। बनारस में तीन दिन तक रोड शो किया। यहां की 8 की 8 सीटें बीजेपी गठबंधन ने जीत ली।
मोदी राजयोग: यूपी में 132 सीटों पर रैली कर 96 जिताई, 5 साल में यूपी में 5 गुना सीटें बढ़ीं
– साफ हो गया कि 3 साल बाद भी मोदी लहर जारी है। मोदी ने यूपी में दलित बहुल इलाकों में 64 सीटें, मुस्लिम प्रभाव वाली 71 सीटें जीतकर अभी से 2019 में “मोदी रिटर्न्स’ का माहौल बना दिया। इसी साल गुजरात और आम चुनाव से पहले 15 राज्यों के चुनाव में भाजपा फायदे में दिख रही।
– यूपी में मोदी 21 रैलियां कर 132 सीटों तक पहुंचे। 96 में जीत मिली। बनारस में तीन दिन बिताने, रोड शो करने से बनारस की 8 सीटों समेत पूर्वांचल की 108 सीटों पर जीत
– कुछ और सख्त फैसले लेंगे। भ्रष्टाचार के खिलाफ “दिखने वाले’ कदम उठाएंगे। विदेशी निवेशकों का भरोसा लौटेगा। इकोनॉमी बढ़ेगी।
– क्षेत्रीय दल भाजपा के खिलाफ एक होंगे। वहीं भाजपा ओड़िशा, तमिलनाडु में वजूद बढ़ाएगी। अकेले चलने के लिए अकाली दल का साथ छोड़ सकती है।
– लोकप्रियता का गुरु प्रबल है। विरोधियों का शनि उग्र रहेगा। 2004 (अटल सरकार) की तरह अति आत्मविश्वास से बचना होगा|
अखिलेश की ग्रहशांति: नतीजे देख बोले- परिवार की लड़ाई से हारे
– 235 रैलियों के बावजूद हार से अखिलेश पार्टी और परिवार में अलग-थलग पड़ेंगे।
– कुल की कलह तेज होगी। सपा फिर टूट सकती है। कई नेता अखिलेश का साथ छोड़ मुलायम-शिवपाल के साथ जा सकते हैं|
राहुल काल: 5 साल में 24 चुनाव हारे, 28 राज्यों में 24% सीटों पर जमानत तक जब्त
– राहुल की अगुवाई में कांग्रेस 63 महीने में 24 चुनाव हारी। राहुल ने 26 दिन की खाट यात्रा की। 48 जिले, 14 मंदिर, 3 मस्जिदें, 6 दरगाहें, 3 गुरुद्वारे और 1 चर्च में गए। 60 साल में पहली बार कांग्रेस को इतनी कम सीटें मिलीं हैं। 5 साल में कांग्रेस ने 24% सीटों पर जमानत गंवाई।
– रोड शो और 10 जनसभाएं कीं। 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन जीते सिर्फ 7 सीटें। पिछली बार से 21 कम।
– कांग्रेस गठबंधन फॉर्मूले पर चलेगी। छोटे दलों को जोड़ेगी। लेकिन कमजोर होती कांग्रेस को नीतीश और ममता अब शायद ज्यादा महत्व ही न दे कई चुनावी राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन संभव। मप्र-गुजरात, कर्नाटक में अध्यक्ष बदले जा सकते हैं। प्रियंका को फिर लाने की मांग दोहराई जाएगी।
– मनोबल कमजोर होगा, लेकिन पार्टी में भाग्य प्रबल बना रहेगा। पार्टी पंजाब की जीत का श्रेय देगी। मंथन-चिंतन शुरू होंगे|
माया की महादशा
– माया ने कहा- वोटिंग मशीनों ने धोखा दिया पहले लोकसभा में शून्य पर सिमटीं, अब विधानसभा में 20 के नीचे पहुंचीं। एकमात्र कोर वोट बैंक दलित भी भाजपा में शिफ्ट हो गया। पार्टी में फूट का खतरा। माया ने हार के लिए ईवीएम में गड़बड़ी को दोषी बताया|