दर्शकों के अखाड़े में भी गोल्ड जीतेगी ‘दंगल

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लंबे वक्त से चर्चा में रही आमिर खान की ‘दंगल’ इस शुक्रवार रिलीज हो रही है| दंगल का निर्देशन किया है नितेश तिवारी ने और फिल्म में मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं आमिर खान, साक्षी तंवर ने और उनकी बेटियां यानी गीता के किरदार में है फातिमा सना शेख और बबीता के किरदार में सान्या मल्होत्रा|

दंगल कहते हैं, उत्तरी भारत में कुश्ती को, जिसका चलन एक जमाने में जोरों पर था|खेल के साथ-साथ ये मनोरंजन का भी जरिया था| दंगल भी घूमती है पहलवानी के इर्द- गिर्द और इसकी कहानी हरियाणा के मशहूर द्रोर्णाचार्य अवॉर्डी पहलवान महावीर फोगट की जिंदगी पर आधारित है जो राज्य के कुश्ती चैंपियन के अलावा ओलंपिक में सीनियर कोच रहे हैं|

फिल्‍म की कहानी की बात करें तो महावीर फोगट को लगता है कि देश पहलवानी में पिछड़ रहा है जिसके चलते हिंदुस्तान के खाते में कुश्ती में गोल्ड मेडल नहीं आया. यही बात महावीर को चुभ जाती है और वो किसी भी हाल में देश को गोल्ड मेडल दिलवाना चाहता है| क्योंकि खुद वो पहलवानी छोड़ चुके हैं तो उम्मीद रह जाती है अपने होने वाले बच्चे से लेकिन उसका पहलवान होने के लिए लड़का होना जरूरी है|

पर महावीर के मंसूबों पर पानी तब फिरता है जब उनके घर में एक के बाद एक चार लड़कियां पैदा होती हैं| लेकिन ये बात महावीर को समझ में जल्दी ही आ जाती है कि गोल्ड मेडल तो गोल्ड मेडल है लड़का जीते या लड़की| दंगल में देशभक्ति है, खेल के प्रति जज़्बा है, एक बाप का बेटी को, बेटे का दर्जा दिलाने का संघर्ष है, बेटियों का पिता के प्रति समर्पण है और खिलाड़ी का अपने गुरू के प्रति विश्वास|

मैं अक्सर खामियां और खूबियों की बात करता हूं अपनी समीक्षाओं में पर इस फिल्म के बारे में मैं ये कहूंगा कि इसमें ना के बराबर खामियां हैं| हालांकि किसी भी खेल फिल्म में ज्‍यादातर वही पहलू होते हैं जो हम पहले भी कई बार देख चुके हैं| पर दंगल ने उन्हीं पहलुओं को नए नजरिए और वास्विकता के साथ दर्शाया है|

इस फिल्म की स्क्रिप्ट और डायलॉग्स आपको हंसाएंगे भी और पर्दे से आपको नजर हटाने नहीं देंगे| इसके भावनात्मक सीन्स आपको रूलाएंगे भी और आप अपनी ही कुर्सी पर बैठे-बैठे बबीता और गीता के साथ कुश्ती भी लड़ेंगे| यानी इस फिल्म का हर लम्हा आप महसूस कर सकेंगे|

यहां आमिर खान की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है| एक पहलवान एक सख्‍त बाप और एक मजबूर पिता, हर भावना का फर्क आप आमिर के अभिनय में साफ देख सकते हैं| सबसे बड़ी बात आमिर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो एक ऐसे एक्टर हैं जो फिल्म की बेहतरी के लिए काम करते हैं नाकि सिर्फ अपने किरदार के लिए| इस फिल्म में भी उन्‍होंने अपने किरदार की लंबाई की परवाह ना किए बगैर अपनी फिल्‍म की कहानी और स्क्रीनप्ले के मुताबिक बाकी कलाकारों को भी खुलकर खेलने के मौका दिया है, जैसा इंडस्ट्री में कम ही देखने को मिलता है|फिल्‍म में गीता के किरदार में फातिमा आश्वस्त भी हैं और एक मंझे हुए कलाकार की तरह पर्दे पर उभर कर आती हैं| सबसे बड़ी बात यहां आमिर हों, फातिमा हों या फिर सान्या मल्होत्रा, इनकी कुश्ती देखकर ही लगता है कि इन्होंने अपने-अपने किरदारों पर जबरदस्त मेहनत की है|

निर्देशन की बात करूं तो नितेश तिवारी को फ़ुल मार्क्स जिन्होंने ईमानदारी के साथ कहानी के साथ न्याय किया है|इस फिल्‍म में कई सीन्स हैं जहां ना बैकग्राउंड स्कोर का सहारा लिया गया है ना ही किसी और इफ़ेक्ट का, फिर भी वो दृश्य इतने प्रभावशाली हैं कि अपनी छाप छोड़ जाते हैं| खासतौर से कुश्तियों के दृश्य जहां सिर्फ दर्शकों की आवाज का इस्तेमाल है. साक्षी तंवर का सहज अभिनय, अमिताभ भट्टाचार्य की उम्दा लिरिक्स, प्रीतम के संगीत से आती हरियाणा की मिट्टी की खुशबू, और सेतू श्रीराम की पकड़ बनाए रखने वाली सिनेमेटोग्राफी इस फिल्म को सीधे दिल में उतारती है और आपको लगेगा कि बहुत दिनों के बाद आपने बेहतरीन फिल्म देखी है जिसका स्वाद आप शायद बिलकुल खोना नहीं चाहेंगे|