ताकि भ्रम न बने

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नोटबंदी के फैसले के नौ दिन बाद भी कतिपय मुद्दों पर भ्रम बने रहना अच्छा नहीं कहा जा सकता। बीते कई दिनों में आते और बदलते आदेशों ने इस भ्रम को बढ़ाने का ही काम किया है। और इसका सबसे ज्यादा खामियाजा बैंक भुगत रहे हैं। बैंकों का शुक्रवार भी उस खबर के बाद असमंजस में बीता, जिसमें कहा गया कि निर्वाचन आयोग ने नोट बदलने की प्रक्रिया में उपभोक्ताओं की उंगली पर स्याही लगाने के फैसले पर ऐतराज जताया है, हालांकि इस खबर का असर यह हुआ कि वित्त मंत्रालय को बाकायदा स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि नोट बदलने में स्याही लगाने का निर्देश चुनाव आयोग से सलाह-मशविरे के बाद ही जारी हुआ, इसलिए आयोग के इस पर ऐतराज जैसी कोई बात ही नहीं है। सच तो यह है कि बुधवार को स्याही लगाने के फैसले की घोषणा के साथ ही इस पर बहस शुरू हो गई थी। बहस के सिरे में एक तरफ जहां 19 नवंबर को होने जा रहे कई राज्यों के उपचुनावों में इसके कारण भ्रम फैलने की चर्चा थी, तो दूसरी ओर बैंककर्मियों की बढ़ने वाली दिक्कतों की बात। कहा गया कि पहले से ही काम के दबाव में आ चुके बैंंक इससे अतिरिक्त दबाव में आ जाएंगे। बैंकों के सामने सरकार के निर्देश और स्याही की अनुपलब्धता का संकट था। यही कारण है कि निर्णय-अनिर्णय के बीच कहीं ‘धोबी इंक’ इस्तेमाल में आ गई, तो कहीं मार्कर का इस्तेमाल शुरू हो गया|

नोटबंदी का फैसला जिस तरह अचानक हुआ, उसकी भले ही किसी स्तर पर आलोचना हुई हो, लेकिन यह सच है कि ऐसेबड़े फैसले प्रभावित होने वालों को संभलने का मौका दिए बिना अचानक ही लिए जाते हैं। यह फैसला ऐसा ही था, पर यह भी सच है कि इसके क्रियान्वयन के तरीके बहुत सुविचारित नहीं थे, जिनके कारण व्यावहारिक दिक्कतें आईं। बैंकों और एटीएम के बाहर लगी लाइनों का अब तक न सिमटना भी इसी का नतीजा है। एटीएम पर्याप्त नोट नहीं दे पा रहे और बैंकों से नोट बदलने की संख्या भी बढ़ती-घटती रही। बैंकों का वक्त यह सोचने में भी जाया हो रहा है कि अगला नियम क्या होगा और उन्हें इसके लिए क्या कदम उठाने होंगे। स्याही लगने से करेंसी बदलने की राशि का घटना-बढ़ना इसी कड़ी में है|

 दरअसल, सारी कवायद के बीच बैंकों की मुश्किलों पर भी गौर करने की जरूरत है। इस सच पर जनता और सरकार, दोनों को सोचना होगा। जनता को धैर्य रखकर किसी तरह की अफरा-तफरी से बचना होगा। उसे यह समझना होगा कि जिन बैंकों में वह साल भर में शायद एक या दो बार गई हो, वे बैंक आज सिर्फ और सिर्फ करेंसी बांटने और बदलने की भीड़ से जूझने में जुटे हैं। तमाम बैंकों में कर्मचारियों की कई रातें बैंकों में ही बीती हैं। इस सारी कवायद के बीच बैंक एक बड़ी चिंता से भी जूझ रहे हैं। दरअसल, इन दिनों में बैंकिंग व्यवस्था जिस तरह सिर्फ करेंसी वितरण में जुटी दिखाई दे रही है, उसका असर इसके अपने वित्तीय ढांचे पर भी पड़ा है। बैंकों के अपने दूसरे कई काम बंद हैं। जमा तो अथाह बढ़ा, लेकिन यह अथाह जमा तभी काम का होगा, जब यह रोटेशन में आएगा। बैंकिंग की भाषा में कहें, तो बिना बाजार में गए इसका रिटर्न नहीं मिलेगा। बैंकों के रूटीन काम बंद हैं। न लोन बांट रहे हैं, न रिकवरी है। नए खाते खुलने बंद हैं। आम सेवाओं पर मिलने वाले सभी तरह के चार्ज बंद हैं। यानी बैंकों की कमाई के कई सारे रास्ते लगभग बंद। ऐसे में, जरूरी है कि रही-सही दिक्कतों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखा और दूर किया जाए। ऐसे उपाय निकाले जाएं कि नोटबंदी के उपजे हालात जल्द से जल्द सामान्य हों। यही आम जनता और देश, दोनों के हित में होगा|