सपा और कांग्रेस का गठबंधन जारी रहेगा, फूलपुर और गोरखपुर के बाय-इलेक्शन में उतारेंगे कैंडिडेट

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कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन आगे भी रहने वाला है, यूपी में योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य की दो लोकसभा सीटें खाली होने वाली हैं। योगी सीएम जबकि मौर्य डिप्टी सीएम बनाए गए हैं। इन दोनों को छह महीने के अंदर विधायक या एमएलसी बनना होगा।

आदित्यनाथ ने मंगलवार को लोकसभा में फेयरवेल स्पीच दी थी। एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक, माना ये जा रहा है कि योगी और और मौर्य जुलाई में होने वाले लोकसभा इलेक्शन के बाद लोकसभा मेंबरशिप से इस्तीफा दे देंगे। कानून के मुताबिक, योगी और मौर्य को शपथ लेने के बाद छह महीने के अंदर यूपी असेंबली के किसी एक सदन का मेंबर बनना होगा। इसके लिए डेडलाइन 15 सितंबर है।
सपा को क्या उम्मीद?
– न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सपा को उम्मीद है कि उप चुनाव (by-election) के जरिए बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की शुरुआत भी हो सकती है जो 2019 में अपोजिशन को मजबूत कर सकता है।
– इस महागठबंधन में बहुजन समाज पार्टी भी शामिल हो सकती है। हालंकि, बीएसपी उप चुनाव नहीं लड़ती। आंकड़ों के मुताबिक, हाल के यूपी असेंबली इलेक्शन में अगर बिहार की तर्ज पर महागठबंधन होता तो उसे 313 सीटें हासिल होतीं, जबकि बीजेपी को सिर्फ 90। सपा के सूत्रों का कहना है कि इस मुद्दे पर विचार कर रही है।
फूलपुर में सपा जबकि गोरखपुर में कांग्रेस
– न्यूज एजेंसी ने एक सपा नेता के हवाले से कहा कि फूलपुर में केशव प्रसाद मौर्य की सीट पर सपा जबकि गोरखपुर में आदित्यनाथ की सीट से कांग्रेस कैंडिडेट चुनाव लड़ सकते हैं। अगर बीएसपी शामिल नहीं होती तो कांग्रेस और सपा ही मिलकर चुनाव लड़ेंगे।
– सूत्र बताते हैं कि अगर सपा-कांग्रेस और बीएसपी मिलकर लड़ती हैं तो बीजेपी को कड़ी चुनौती पेश की जा सकती है।
यहां भी जातिवाद का गणित
– फूलपुर में सपा कुर्मी कम्युनिटी का कैंडिडेट उतार सकती है। जबकि गोरखपुर में कांग्रेस किसी ब्राह्मण को टिकट दे सकती है। बता दें कि देश के पहले प्राइम मिनिस्टर जवाहर लाल नेहरू भी फूलपुर से चुनाव लड़ चुके हैं।
– 1989 के लोकसभा चुनाव में भी यहां से कुर्मी कम्युनिटी का कैंडिडेट ही उतारा गया था। कांग्रेस भी उप चुनाव सपा के साथ ही लड़ना चाहती है। उसका ये भी मानना है कि योगी जो खुद एक राजपूत हैं, के सीएम बनने से राजपूत और ब्राह्मण फिर ताकतवर हो सकते हैं।
– बता दें कि यूपी असेंबली इलेक्शन के शुरुआती दौर में कांग्रेस ने शीला दीक्षित को सीएम कैंडिडेट बनाया था। लेकिन बाद में उसका सपा से अलायंस हो गया और अखिलेश यादव सीएम फेस के तौर पर पेश किए गए।