प्रख्यात शायर पद्ममश्री बेकल उत्साही का इंतकाल

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प्रख्यात शायर पद्ममश्री बेकल उत्साही का आज इंतकाल हो गया। उन्होंने आज सुबह नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके इंतकाल की पुष्टि उनके पुत्र ने की है।बेकल उत्साही को दिन पहले ब्रेन हैमरेज के कारण राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बेकल उत्साही के निधन से देश के साहित्य जगत में शोक की लहर है। बेकल उत्साही का शव आज दिल्ली से बलरामपुर लाया जायेगा। उनका अंतिम संस्कार बलरामपुर में ही होगा। उनके छोटे पुत्र कुंवर अजीज ने बताया कि आज शाम तक बलरामपुर में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा|

पूर्व राज्यसभा सदस्य पद्मश्री बेकल उत्साही की यह पक्तियां उन्हें जन्म जन्मान्तर तक जिंदा रखेंगी। आज उनके इंतकाल से शेरो शायरी में गंगा जमुनी तहजीब का जैसे सूर्य अस्त हो गया। एक नए परम्परा के जन्मदाता पद्मश्री बेकल उत्साही ने उर्दू व हिन्दी भाषा को पूरा सम्मान दिया। स्थानीय भाषा के मिश्रण से उन्होंने गजल व शेरो शायरी में कई प्रयोग किए जो श्रोताओं के सिर चढ़कर बोला।पद्मश्री बेकल उत्साही का जन्म एक जून 1924 को ग्राम रमवापुर, उतरौला बलरामपुर में में जमींदार पिता लोदी मोहम्मद शफी खान के यहां हुआ था। माता का नाम बिस्मिल्लाह बीबी था। बेकल का असली नाम शफी खान है और गांव के लोग प्यास से इन्हें भुल्लन भैया कहकर पुकारते थे। अक्सर ही भीड़-भाड़ में रहने वाले बेकल उत्साही को अकेलापन पसंद था|

गुलामी के दौर में बेकल अंग्रेज हुक्मरानों के खिलाफ जवानी में राजनीतिक नज्म व गीत लिखने लगे। अंग्रेजों को यह हरकत नागवार गुजरी और बेकल को कई बार जेल जाना पड़ा। जेल से ही उन्होंने नातिया शायरी की शुरुआत की। बेकल उत्साही ने हमेशा साम्प्रदायिकता के खिलाफ धर्म निरपेक्षता के लिए हिन्दी और उर्दू भाषा को आपस में मिलाकर एक नई शैली प्रदान की। जिसे बेकल शैली कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी\

बेकल उत्साही पूरी तरह से अदबी माहौल में रहने लगे और मुशायरा, नातिया व मजहबी जलसों तथा कवि सम्मेलनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने लगे। गजल में क्षेत्रीय भाषा का अक्स मिलाकर उसे नई राह दी। कोई भी देश अछूता नहीं था जहां उनकी शायरी का लोहा न माना गया हो। उन्होंने कई बार इंग्लैंड, अफ्रीका के साथ पाकिस्तान व अमेरिका का दौरा किया।उन्होंने 1952 में विजय बिगुल कौमी गीत, 1953 में बेकल रसिया लिखी। इसके बाद उन्होंने गोण्डा हलचल प्रेस, नगमा व तरन्नुम, निशात-ए-जिन्दगी, नूरे यजदां, लहके बगिया महके गीत, पुरवईयां, कोमल मुखड़े बेकल गीत, अपनी धरती चांद का दर्पण जैसी कई किताबें लिखीं। उनके गंगा जमुनी संस्कृति का मिश्रण एवं साहित्यिक सेवाओं में विशेष योगदान से प्रभावित होकर 1976 में उन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। पद्मश्री बेकल उत्साही को कांग्रेस ने अपने कोटे से 1986 में राज्यसभा भेजा था|