सपा से गठबंधन के विरोधी रहे राज बब्बर के बदले बोल, माफी भी मांगी

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उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष राज बब्बर को यदि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के लिए सबसे मुखर विरोधी के रूप में देखा जाता है, तो तस्वीर अधिक भ्रामक हो सकती है। सपा पर तीखी टिप्पणी करने वाले राज बब्बर का अंदाज बदला सा नजर आ रहा है, यहां तक कि उन्होंने 2009 में फिरोजाबाद से डिंपल यादव की हार के लिए माफी भी मांग ली।

अभिनेता से नेता बने राज बब्बर न केवल 2009 के लोकसभा उपचुनावों में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी को हराने के लिए माफी मांगते दिखे, बल्कि अब वे यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने फिरोजाबाद विधानसभा क्षेत्र 2014 में इसलिए ही छोड़ा, ताकि यादव परिवार से टकराव न हो। एक टीवी साक्षात्कार के दौरान 2017 के चुनावों के लिए सपा के साथ कांग्रेस के गठबंधन को लेकर बातचीत के दौरान उन्होंने यह बात स्वीकार की।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पिछले हफ्ते कहा था कि हालांकि उनकी पार्टी सिर्फ अपने बूते पर बहुमत पा लेने में सक्षम है, लेकिन फिर भी अगर कांग्रेस और सपा एक साथ आ जाएं तो इस गठबंधन को तीन सौ से ज्यादा सीटें मिलेंगी। अखिलेश इससे पहले भी कई बार ऐसे बयान दे चुके हैं।

कुछ समय पहले ही कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिले थे। बता दें कि मुलायम सिंह के साथ कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मुलाकात को लेकर बब्बर ने काफी कुछ बोला था। इसके अलावा गठबंधन विरोधी बयानों के कारण बब्बर को 2006 में सपा से निकाला गया था और बब्बर के दोहरे चेहरे पर सवाल भी उठे थे।

उत्तर प्रदेश से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके राज बब्बर ने 1989 में जनता दल के जरिए राजनीति में प्रवेश किया। इसके बाद वह सपा मं शामिल हो गए। राज बब्बर पहली बार 1994 में सपा से राज्यसभा के लिए चुने गए। वहीं 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा के टिकट पर जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 2006 में सपा से हट गए और 2008 में कांग्रेस में शामिल हो गए।

साक्षात्कार में बब्बर ने बताया कि मुलायम सिंह उनके लिए आदरणीय हैं और उन्होंने 2009 के फिरोजाबाद उपचुनाव में डिंपल यादव को हराकर किसी तरह के छल करने से इंकार किया। यादव की मजबूत दावेदारी में डिंपल की हार मुलायम और बेटे अखिलेश के लिए शर्म का कारण बनी थी, इसपर स्पष्टीकरण देते हुए बब्बर ने बताया, ‘जब मैं फिरोजाबद गया, तो वहां परिवार से कोई नहीं था और सपा से बाहर का कोई चुनाव में खड़ा हुआ था। इसके बाद 26 अगस्त को मेरे नाम की घोषणा हुई, 4 सितंबर को परिवार से एक बच्ची (डिंपल) चुनाव के लिए मैदान में आ गयी। मैं मजबूर था और अपना नाम वापस नहीं ले सकता था। चुनाव हुआ और मैं जीत गया।‘