फिर एक चेतावनी

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ग्रीनपीस के ताजा अध्ययन ने एक बार फिर हमें आगाह किया है कि अगर हम अब भी वायु प्रदूषण को लेकर गंभीर न हुए, तो बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी-अभी दिल्ली सहित देश के कई इलाकों में कई दिनों तक धूल और धुएं की काली परत का गवाह बने लोगों के लिए यह सूचना हतोत्साहित करने वाली है कि वायु प्रदूषण के मामले में भारत ने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। यह जानकारी इसलिए भी निराश करने वाली है कि इस सदी की शुरुआत में जो चीन बार-बार वायु प्रदूषण के मामले में खराब रिपोर्ट दे रहा था, उसने अपने तरीके से इस पर नियंत्रण पा लिया, लेकिन हम तमाम चेतावनियों और हकीकतों से रूबरू होने के बावजूद फिसड्डी रह गए।

40 से ज्यादा देशों में पर्यावरण पर काम कर रहे संगठन ग्रीनपीस की रिपोर्ट भारत के लिए गंभीर चेतावनी है। दोनों देशों के वायुमंडल का 2015 का यह अध्ययन बताता है कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण पिछले वर्ष चीन से कहीं ज्यादा मौतें हुईं। दरअसल, यह सब मुश्किलों को गंभीरता से न लेने और तात्कालिकता में जीने की हमारी प्रवृत्तियों का नतीजा है। वरना कोई कारण नहीं कि अभी-अभी कई दिनों तक धुंध और धुएं के काले गुबार में डूबे रहे हम अपना कष्ट इतनी जल्दी भूल जाते। उस वक्त जिस तरह की चौतरफा बेचैनी दिखाई दी, उससे धुंध का गुबार आकाश से तो छंटा, पर वहां से हटकर हमारी सोच पर हावी हो गया। हमने फिर अपनी ही रफ्तार पकड़ ली। वह सब होने लगा, जो न करने की हमने कसमें खाई थीं|

 साल 2003 से 2015 के बीच नासा के सैटेलाइट-डाटा के विश्लेषणों पर आधारित ग्रीनपीस की रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में चीन का वायु प्रदूषण स्तर चरम पर था, पर इसके बाद धीरे-धीरे कम होने लगा। भारतीय वायुमंडल का सच कहता है कि पिछले एक दशक में हमारा आकाश तमाम तरह की जहरीली गैसों से लगातार खराब हुआ और 2015 में यह चरम पर पहुंच गया। चीन ने तो 2013 में मची हाय-तौबा के बाद एक्शन प्लान बनाकर जिस तरह अपना आकाश संभाल लिया, उसके पीछे कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों और उद्योगों के लिए न सिर्फ सख्त नियमों का बनना था, वरन मानकों को सख्ती से लागू भी किया जाना था। लेकिन भारत का सच इसके विपरीत है, ज्यादा खतरनाक भी। भारत में वायु प्रदूषण का स्तर 2005 के बाद साल दर साल लगातार बढ़ा है। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश व राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जैसे राज्य और पटना, कोलकाता, दिल्ली, गोरखपुर, कानपुर और वाराणसी जैसे शहरों की हवा सबसे ज्यादा खराब मानी गई है। यह भी सच है कि प्रदूषण का शिकार ऐसे किसी शहर के पास प्रदूषण की मॉनिटरिंग के लिए कोई सिस्टम नहीं है, जबकि चीन ने कम समय में ही अपना यह तंत्र खासा मजबूत कर लिया|

हालात यूं ही नहीं बिगडे़ हैं। दरअसल, अपने यहां इस पर कभी समेकित प्रयास हुए ही नहीं। नीतियां बनीं, नियम बने, पर इन्हें लागू करने के लिए जैसी इच्छाशक्ति चाहिए थी, वह किसी स्तर पर नहीं दिखी। वरना कोई कारण नहीं कि हमारा आकाश एक सप्ताह तक कराहता रहता। हमारी नदियां सफाई के लिए विलाप करती रहतीं। कोई कारण नहीं कि जिस समय सीमा में चीन अपने वायुमंडल की गंदगी को 17 प्रतिशत तक घटा ले जाता, हम उसी दौर में अपने वायुमंडल का जहर 13 प्रतिशत बढ़ा जाते। ग्रीनपीस की इस बात से भी नाइत्तफाकी का कोई कारण नहीं कि चीन ने वायु प्रदूषण के मामले में जैसे सकारात्मक परिणाम दिए हैं, वह उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली नीतियों और सख्त अनुपालन से ही संभव था, जो हमारी भ्रष्ट व्यवस्थाओं में आसान नहीं दिखता। जाहिर है, यह तभी हो पाएगा, जब हम पूरी तरह पारदर्शी, समयबद्ध कार्ययोजना और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ेंगे। सिर्फ नारे नहीं देंगे। सिर्फ नारे नहीं देंगे। सिर्फ फोटो नहीं खिंचवाएंगे|