ऑक्सफोर्ड में लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को ‘ही’ और ‘शी’ नहीं ‘ज़ी’ कहकर बुलाएंगे

7
SHARE

अब ऑक्सफोर्ड में लड़के-लड़कियां एक-दूसरे को ‘ही’ और ‘शी’ नहीं ‘ज़ी’ कहकर बुलाएंगे, ताकि स्त्री-पुरुष का भेदभाव खत्म हो| यूनिवर्सिटी ने इस संबंध में गाइडलाइन जारी की है और कहा है कि ज़ी बोलने से ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स असहज नहीं महसूस करेंगे|ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने लिंग भेद खत्म करने के लिए एक अनोखी पहल की है| इस पहल के तहत काफी जमीनी स्तर पर लोगों ने सोचा और यह निर्णय लिया कि एक-दूसरे के संबोधन में बदलाव किया जाएगा|

‘ज़ी’ शब्द का प्रयोग अक्सर ट्रांसजेंडर लोगों द्वारा किया जाता है| इससे लैंगिक समानता भी आएगी. यूनिवर्सिटी संघ की ओर से छात्रों के लिए जारी की गई पुस्तिका में जेंडर न्यूट्रल प्रोनाउन्स का जिक्र किया गया है| इसमें यह भी कहा गया है कि यह कदम ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स के खिलाफ हिंसा को कम करने के लिए उठाया गया है|ऑक्सफोर्ड में बिहेवियर कोड (सामान्य व्यवहार) के मुताबिक कोई भी व्यक्ति ट्रांसजेंडर स्टूडेंट्स के लिए गलत टिप्पणी नहीं कर सकता है| छात्रों का आशा है कि यह प्रयास आने वाले समय में यूनिवर्सिटी के लेक्चर्स और सेमिनार्स में भी देखने को मिलेगा| ट्रांसजेंडर स्टूडेंट फ्रैंकी सिजंस कहते हैं ‘जेंडर न्यूट्रल प्रोनाउन्स बहुत ही अच्छा कदम है. यह तो लेक्चर्स में भी होना चाहिए|’

एलजीबीटी अधिकारों को लेकर कैंपेन चलाने वाले पीटर टशेल कहते हैं कि ‘यह काफी पॉजीटिव चीज है| इससे लिंग भेद खत्म होगा|जेंडर न्यूट्रल प्रोनाउन्स उन लोगों के लिए काफी अच्छा है जो ऐसा चाहते हैं, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए| यह ऐसा विषय है जिसे राजनीतिक तौर पर कोई सेंसर नहीं कर सकता है| जरूरत लैंगिंग भेद को लेकर मानसिकता बदलने की है|लोगों की पहचान पुरुष और महिला से नहीं होनी चाहिए|’

यूनिवर्सिटी के ऑक्सफोर्ड कॉलेज में इस गाइडलाइन को लागू कर दिया गया है| ऐसा करने वाला यह पहला संस्थान है| सेंट कैथरीन कॉलेज को उम्मीद है कि पूरी यूनिवर्सिटी में इस तरह के प्रयास को अपनाया जाएगा| साथ ही महिला और पुरुष के लिए शौचालय के नए साइन भी बनाए जाएंगे|वहीं, कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने भी इस तरह के कदम उठाने के संकेत दिए हैं|इससे पहले ब्रिटेन के कुछ स्कूलों ने भी ऐसी पहल की हैं| स्कूलों ने पैरेंट्स को पत्र लिखकर कहा था कि वे लड़के और लड़कियों को एक जैसे यूनीफार्म में ही स्कूल भेजें|इसके अलावा कुछ कॉलेजों ने भी महिला पुरुष लिखने को भी मना कर दिया है|