‘आग’ से खेलने की हिम्मत सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी में है!

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आज चीन के दो सरकारी अखबारों ने तल्ख टिप्पणी करते हुए लिखा है कि भारत आग से खेल रहा है । दरअसल, चीन तिब्बती धर्म गुरु और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा के अरुणाचल प्रदेश के दौरे से बौखलाया हुआ है। दलाई लामा एक हफ्ते के अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर हैं, यहां तवांग में बौद्ध अनुयायियों ने उनके लिए कई कार्यक्रम रखा है। चीन को जब से दलाई लामा के दौरे की ख़बर लगी है, तभी से वो अपना विरोध जता रहा है। कल चीनी विदेश मंत्रालय ने बीजिंग में भारतीय राजदूत को तलब कर कड़ा विरोध जताया। लेकिन भारत ने चीनी विरोध को खारिज कर दिया । गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने दलाई लामा को एक धार्मिक नेता बताया और चीन का भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की सलाह दी ।
दलाई लामा जब भी उत्तर पूर्व के दौरे पर होते हैं, चीन विरोध जताता है। दरअसल, चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा मानता है, और भारत पर अवैध रूप से कब्जे का आरोप लगाता है  परंतु भारत हमेशा से इसका विरोध करता रहा है।
14वें दलाई लामा 1959 से भारत में राजनीतिक शरण लिए हुए हैं । 1959 में चीनी दमन के कारण दलाई लामा समेत लाखों तिब्बतियों अपना घर छोड़ दिया और भारत में आकर शरण लिए । चीन दलाई लामा को अलगाववादी मानता है । दलाई लामा जब भी यूरोप, अमेरिका या अफ्रीकी देशों के दौरे पर जाते हैं तो चीन आधिकारिक रुप से उन देशों से भी विरोध दर्ज कराता है । दलाई लामा की यात्रा के कारण चीन ने कई यूरोपिय देशों को चेतावनी तक दी । चीन के बढ़ते आर्थिक, सैन्य प्रभुत्व के कारण अब कई देशों ने दलाई लामा की यात्रा पर अघोषित रूप से प्रतिबंध लगा दिया ।
भारत में दलाई लामा आए दिन किसी न किसी सामाजिक या धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने राज्यों का दौरा करते रहते हैं। लेकिन ज्यादातर समय उसका प्रचार प्रसार नहीं होता है । लेकिन 2014 के बाद से हालात बदले हैं। अब भारत सरकार और मीडिया कूटनीतिक रुप से दलाई लामा के कार्यक्रमों को महत्व देते हैं । कुछ महीने पहले एक कार्यक्रम में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की दलाई लामा से मुलाकात को काफी प्रचारित किया गया था । और उससे बौखलाए चीन ने प्रतिक्रिया दी थी।
हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद भारत ने कई मौके पर चीन के साथ वर्षों से उलझे संबंधों को सुलझाने की कोशिश की, और अंतरर्राष्ट्रीय भूमिका  में चीन के सहयोग की अपेक्षा की, लेकिन चीन उभरते भारत को अपने बराबर कभी देखना नहीं चाहता और यही कारण है की हर वक्त कोई न कोई अड़ंगा लगाता रहता है, जैसे एनएसजी और संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन ने रोड़ा अटकाया । चीन भारत की संप्रुभता से खेलने के लिए पाकिस्तान के साथ का मिलकर  भी साजिश रच रहा है। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर इसका उदाहरण है । चीन अपनी बढ़ती आर्थिक शक्ति के सहारे एशिया में धौंस जमाना चाहता है । लेकिन प्रधानमंत्री मोदी अब चीन से बराबरी के स्तर पर बात करना चाहते हैं। चीन की धमकियों से बेपरवाह दलाई लामा को हर जाने की इजाजत देना और उसको प्रचारित करना पीएम मोदी के कॉन्फिडेंश को दिखाता है । वैसे चीन को अपनी हद में रहने का संदेश मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ महीने बाद ही दे दिया था जब पहले विदेश दौरे पर जापान पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने चीन का बिना नाम लिए कहा था कि ”दुनिया 21वीं सदी में पहुंच गई है, लेकिन कुछ देश आज भी 18वीं सदी जैसी साम्राज्यवादी मानसिकता में जी रहे हैं” । आपको बता दें की चीन का जापान के साथ भी सीमा विवाद समेत कई मुद्दों को लेकर टकराव चल रहा है।
जाहिर है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी हिन्दुस्तान के सबसे पॉपुलर और ताकतवर नेता हैं । ये बातें उनके राजनीतिक और कूटनीतिक फैसलों में भी दिख रही है। मोदी अब चीन के साथ आंख में आंख मिलाकर बात करना चाहते हैं । इसीलिए अब चीन को भी धमकियों की बजाए दुनिया की सबसे तेजी से उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था से सम्मानपूर्व बात करना सीखना होगा।