ओम प्रकाश राजभर यूपी में भाजपा के लिए क्यों और कितने जरूरी हैं ?

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उत्तर प्रदेश में भाजपा ने अपने दोनों सहयोगी दलों को मनाया और उनकी लगभग हर मांग को मान लिया। भाजपा के यह सहयोगी दल अपना दल और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी हैं। इनमें से अपना दल के सुर एकाध मौकों को छोड़ कर लगभग हमेशा ही भाजपा के साथ मिलते दिखाई दिए हैं लेकिन सुभासपा भाजपा के साथ रहते हुए भी तीखी लड़ाई लड़ती रही है और इसके बावजूद भाजपा इस पार्टी और इसके नेता ओम प्रकाश राजभर के खिलाफ कोई एक्शन लेने की बजाय समझौता करती दिखाई देती है।


कुछ हफ्तों पहले ही एक इंटरव्यू में जब ओम प्रकाश राजभर से पूछा गया था कि वह अपनी मांगों को लेकर इतना अड़े हुए हैं, वह योगी आदित्यनाथ जैसे मुख्यमंत्री और भाजपा जैसी मजबूत पार्टी के आगे कहां खड़े होते हैं तो राजभर का जवाब था कि वह इनसे ज्यादा हठी हैं। अपनी मांगें मनना पर राजभर ने इसे साबित भी किया। पिछले दिनों ओम प्रकाश राजभर नाराजगी में पिछड़ा वर्ग मंत्रालय का प्रभार लौटाने की चिट्ठी लेकर निकल पड़े थे लेकिन मुख्यमंत्री उनकी पेशकश को खारिज कर उन्हें मनाने में लगे थे।


खबरें हैं कि भाजपा ने सुभासपा को भी अपना दल की तरह से ही दो लोकसभा सीटें चुनाव लड़ने के लिए देने का आश्वासन किया है। अब सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण है कि भाजपा कड़वे घूंट पीकर भी ओम प्रकाश राजभर को साथ रखना चाहती है। ओम प्रकाश राजभर और उनकी राजनीति पर गहराई से नजर डालें तो वह पूर्वांचल के ऐसे नेता हैं जिन्होंने पैसों की कमी के बावजूद, बिना किसी संसाधनों के भी अपनी पार्टी का मजबूत जातिगत आधार खड़ा किया और इसके बूते सत्ता में हिस्सेदारी हासिल करने में कामयाब रहे।


ओम प्रकाश राजभर ने बसपा से अलग होने के बाद 2002 में ही अपनी पार्टी का गठन कर लिया था। 15 साल तक उन्हें चुनावी कामयाबी नहीं मिली लेकिन उनका वोटबैंक बढ़ता गया। यही वजह रही कि जुलाई 2016 में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मऊ के रेलवे मैदान में उनके साथ रैली कर उन्हें साथ लेकर चलने की घोषणा कर पूर्वांचल में बड़ा दांव खेला था। 2017 के विधानसभा चुनाव में राजभर की पार्टी चार सीटों पर जीती। राजभर का दावा है कि भाजपा को उन्होंने लगभग सवा सौ सीटों पर जीत दिलाने में मदद की।


राजभर योगी सरकार में मंत्री बने, लेकिन शांत बैठ कर सत्ता सुख लेने में व्यस्त नहीं रहे, ना ही उन्होंने अपने कैडर को शांत बैठने दिया। उनकी बातें नहीं मानी गईं तो नाराज़ ओम प्रकाश राजभर न सिर्फ भाजपा को आड़े हाथों लेते रहे, बल्कि सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते रहे। आखिरकार यूपी के आयोगों और निगमों में भाजपा को अपने लोगों को हटा कर राजभर के लोगों को जगह देनी पड़ी।


राजभर और उनकी पार्टी भाजपा के लिए कितनी जरूरी है, इसे और अच्छी तरह समझने के लिए जरा इन आंकड़ों पर गौर कीजिए। सुभासपा ने साल 2014 में मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल और कुछ अन्य छोटे दलों के साथ समझौता किया था। इस गठबंधन को 19 लोकसभा सीटों पर 25 हजार से 1.5 लाख के बीच वोट मिले थे। यही नहीं सुभासपा ने साल 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान अकेले दम पर चंदौली में 1.03 लाख वोट, बलिया में 75 हजार वोट, सलेमपुर में 65 हजार वोट, घोसी में 75 हजार वोट, वाराणसी में 40 हजार वोट और बस्ती में करीब 45 हजार वोट हासिल किए थे।


ऐसे वक्त में जब कि यूपी में सपा-बसपा गठबंधन की चुनौती सामने खड़ी है, ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भाजपा के लिए बेहद जरूरी है। राजभर की पार्टी का कैडर वोट जीत-हार का फर्क तय कर सकता है। यही राजभर की असली ताकत है जिसकी भाजपा अनदेखी तो कतई नहीं कर सकती।