व्यक्तित्व वह जो दूसरे को बदल दे

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सन् 1921 की बात है, महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन की लहर में न जाने देश के कितने नौजवानों ने अपने जीवन की कुर्बानी देने का संकल्प कर लिया था। उन्हीं दिनों जवाहर लाल नेहरू ने, जो इलाहाबाद के प्रतिभाशाली वकील थे, देश-सेवा के प्रति अपने को समर्पित कर दिया। वे अपने मित्रों के साथ गाँव-देहात की यात्रा करते, ग्रामीणों के दुःख-सुख सुनते और उनकी समस्ययाओं के निदान के लिए क्रियाशील रहते। विदेश में पढ़े, आनन्द भवन के राजसी परिवेश में पले नेहरू देश-सेवा में इतने व्यस्त कि आनन्द भवन लौटने का को कोई ठिकाना नहीं। इसी तरह एक समय तीन दिन बीत गए, जवाहर घर नहीं लौटे। पिता पंडित मोतीलाल नेहरू अपने जमाने के रईस और माँ स्वरूपरानी अपने पुत्र की यह दशा देख चिंतित रहने लगे। एक दिन सुबह चिंतामग्न मोतीलाल नेहरू राजर्षि पुरूषोत्तम दास टण्डन के घर पहुंचे। राजर्षि को जब सूचना मिली, तो उन्होंने मोतीलाल जी से मुलाकात में कहा, ‘इतनी सुबह स्वयं क्यों कष्ट किया, खबर भेजते मैं खुद मिलने आ जता’, तुरन्त मोतीलाल नेहरू ने कहा, ‘भीख माँगने वाले को दूसरे के घर जाना ही पड़ता है।’ टण्डन जी ने कहा, ‘आप यह क्या कह रहे हैं? मैं आपको भला भीख देने लायक हूं? आपको देने लायक मेरे पास क्या है?’ नेहरू ने कहा, ‘तुम देने लायक हो। मैं अपने जवाहर को तुमसे भीख मांगने आया हूं। हम और स्वरूपरानी दोनों उसके बिना बहुत दुःखी हैं। उन्होंने तुम्हारे पास मुझे भेजा है और कहा है कि जवाहर के ऊपर टण्डन जी का पूरा अधिकार है। वह चाहेंगे तो जवाहर हमारे घर आ जाएगा।’ ऐसा कहकर मोतीलाल जी की आँखें भर आयीं।

टण्डन जी मोतीलाल नेहरू की बातें सुनकर आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने कहा, ‘साफ-साफ बताइए कि क्या बात है, मैं इस संबंध में कुछ नहीं जानता। सिर्फ इतना ही जानता हूं कि वह क्रांग्रेस में दिलचस्पी के साथ कार्य करता है और कार्य में मुझसे परामर्श भी लेता है।’ मोतीलाल नेहरू ने कारूणिक स्वर में कहा, ‘टण्डन जी! जवाहर के बिना हम लोग परेशान हैं, उसको मुझे दे दो, उसका जीवन बर्बाद होने से बचा दो।’ टण्डन जी के चेहरे पर विस्मय, क्रोध और उदारता एक साथ झलक रही थी। उन्होंने कहा, ‘जवाहर आपका पुत्र है, उस पर आपका पूरा अधिकार है, माता-पिता की आज्ञा मानना उसका पहला कर्तव्य है, पहले माता-पिता की सेवा फिर अन्य सेवा। जो अपनी सेवा से ऐसे परिवार को संतुष्ट नहीं कर सकता वह इतने बड़े देश को अपनी सेवा से कैसे सन्तुष्ट करेगा? मैं नहीं जानता था कि जवाहर ने आप लोगों की आज्ञा के बिना राजनीति में प्रवेश किया है- मैं अभी बुलाकर उसे समझाता हूं।’ टण्डन जी ने क्रांग्रेस कमेटी से जवाहर लाल को बुलवाया। कमरे में घुसते ही उन्होंने अपने पिता को बैठे पाया । टण्डन जी ने कहा, ‘जिस पिता ने तुम्हें योग्य बनाने में इतना सहयोग दिया है, उसकी आज्ञा से चलना तुम्हारा प्रथम कर्तव्य है। ये लोग तुम्हारा भौतिक सुख देखना चाहते हैं। मैं तुम्हे सलाह देता हूं कि तुम पिताजी के साथ घर जाओ और इनके अनुशासन में रहकर जीवन को आदर्श बनाओ।’ टण्डन जी की इन बातों से जवाहर का चेहरा तमतमा उठा। वह झट उठे और बिना किसी से कुछ कहे सुने कहीं चले गए। जवाहर के चले जाने के बाद मोतीलाल जी और टण्डन जी एक-दूसरे को कारूणिक भाव से देखते रहे। टण्डन जी ने निस्तब्धता तोड़ते हुए कहा, ‘मैं उसे बुलाकर फिर समझाऊँगा और तीन-चार दिन में आपसे मिलकर बताऊँगा। इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं।’

दो-तीन दिनों तक जवाहर का कहीं पता नहीं था। वे अपने साथियों के साथ ग्रामीणों से मिलने चले गए थे। इधर टण्डन जी ने खोज खबर ली- कुछ पता नहीं चला और आनन्द भवन में उदासी का वातावरण था। मोतीलाल जी और पत्नी स्वरूपरानी को अपने पुत्र को देखे तीन दिन बीत गए। उनकी बेचैनी बढ़ती गयी।

तीसरे दिन जवाहर लाल से टण्डन जी की मुलाकात हुई। टण्डन जी ने उन्हें आनन्द भवन अपने माता-पिता के पास जाने को कहा। जवाहर लाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘बाबूजी, मैं कौनसा बुरा काम कर रहा हूं कि जिससे वे लोग असन्तुष्ट हैं। देश सेवा करना क्या पाप है? वे लोग मुझे सुख-भोग की ओर ले जाना चाहते हैं। उसके लिए धन पैदा करने का प्रोत्साहन देते हैं। मैं न तो सुख-भोगना चाहता हूं और न पैसा कमाना चाहता हूं। देश की गरीबी और अंग्रेजों द्वारा देश का शोषण मुझसे देखा नहीं जा रहा है। मेरी रूचि जिस ओर है मैं वही करूँगा चाहे मुझे कितना भी कष्ट क्यों न हो। यदि माता-पिता मुझे इस काम से अलग करने पर तुल जाएंगे, तो मैं आनन्द भवन जाना एकदम बन्द कर दूंगा।’ टण्डन जी चुप हो गए।

मेतीलाल नेहरू को धैर्य कहाँ? वे चौथे दिन सुबह पुनः टण्डन जी के मकान पर पहुंच गए। उन्होंने कहा- ‘लगातार तीन दिन से जवाहर के आनन्द भवन न जाने से सबको बड़ी चिन्ता हो गयी है और तरह-तरह के विचार हम लोगों के दिल में पैदा हो रहे हैं? हम लोग बहुत परेशान और चिंतित हैं।’ टण्डन जी ने जवाहर लाल की सारी बातचीत को जैसा का तैसा कह दिया।

पुत्र की ऐसी प्रतिज्ञा से मोतीलाल जी विहल हो उठे और निराश हो कहने लगे- ‘इस प्रकार जवाहर का वियोग हम लोगों की शक्ति के बाहर है। वह मेरा एकमात्र पुत्र है। उसकी ममता हम लोगों के एक-एक रोम में समायी हुई है। वह हम लोगों के लिए अनमोल रत्न है- उसके दर-दर भटकने और कष्ट उठाने से हम लोगों को बहुत ही तकलीफ होती है। जिस प्रकार राजकुमार की तरफ बचपन से लेकर अब तक मैंने उसे सुख से पाला, पोसा, पढ़ाया, लिखाया, योग्य बनाया। वह दिन भूलाने से भी भूल नहीं सकते, बड़ी-बड़ी लालसाएँ मन में थीं, काफूर हो गयीं। अपने जीवन में बड़े-बड़े काम किए। कितने ही कठिन मामलों को सुलझाया, किन्तु इसमें मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है, तुमसे बहुत आशा थी कि जवाहर तुम्हारे कब्जे में है। वह मुझे जरूर मिल जाएगा, लेकिन अब वह भी आशा नहीं है। तुम्हीं बताओ पुरूषोत्तम, मैं क्या करूँ। जवाहर के बिना हमारा सुख भोग वृथा है। हम लोगों के प्रति उसकी ममता कहां चली गयी? किसने उसके ऊपर जादू किया? बताओ टण्डन बोलो मैं कैसे क्या करूँ? मुझे कैसे शान्ति मिले। जवाहर के बिना मुझे शान्ति नहीं। मुझे जवाहर चाहिए।’ आवेश में बोलते-बोलते मोतीलाल जी चुप हो गए।

टण्डन जी ने कहा- ‘मैं आपकी अन्दरूनी भावनाओं को खूब समझ रहा हूं। पुत्र के प्रति पिता की ममता मेरे हृदय को पिघला रही है। आपके दुःख से मैं दुःखी हूं। पिता-पुत्र का बिछोह न हो यह मैं हृदय से चाहता हूं। आपकी शान्ति के लिए इस समय इससे बढ़कर अन्य कोई सुझाव मुझे नहीं सूझता।’ मोतीलाल जी ने बड़ी उत्सुकता से सुझाव देने को कहा। टण्डन जी ने कहा, ‘आपने और आपके परिवार ने अपने जीवन में जो सुख-भोग किया, वह विरले ही धनी-मानी तथा राजा-महाराजाओं ने किया होगा। नाम कमाने के साथ ही आपने पर्याप्त धन भी कमाया, ऐसा कोई सुख नहीं रह गया है, जिसे आपने न भोगा हो, आपके जीवन की सारी लालसाएं पूरी हो चुकी हैं, अब आप वह काम कीजिए, जिससे आपका जवाहर आपको मिल जाए।’ मोतीलाल जी ने कहा, ‘बताइए, बताइए मैं क्या करूँ?’ टण्डन जी ने कहा, ‘मेरा सुझाव है आप राजनीति में आ जाइए। आपके महान् व्यक्तित्व और महान् योग्यता से देश को अत्यन्त लाभ होगा। जिस तरह की ख्याति अभी तक आपको मिल चुकी है, उससे भिन्न और बहुत ऊँची ख्याति आपको मिलेगी। देश की त्रस्त जनता आपके प्रयत्नों से सुखी होगी। देश के अनेक लाड़ले आप पर निछावर होंगे। आपका जवाहर स्वयं आकर आपकी छाती से लिपट जाएगा, बिना कहे आपका आज्ञाकारी बन जाएगा। मेरी प्रेरणा है कि आप अपने जवाहर के लिए ही सही इसमें देर न कीजिए।’ पंडित मोतीलाल नेहरू बिना कुछ बाले चले गए।

तीन दिन बाद अखबार के मुख पृष्ठ पर छपा कि इलाहाबाद के प्रख्यात वकील पंडित मोतीलाल नेहरू ने वकालत छोड़ दी और राजनीति में प्रवेश किया। सूचना पढ़ते ही जवाहर लाल टण्डन जी के पास गए और आश्चर्य चकित होकर कहा, ‘बाबूजी, आपने क्या जादू कर दिया।’ दोनों आनन्द भवन गए। माता-पिता ने जवाहर को देखा और छाती से चिपका लिया। सच है, दीप से दीप जलता है। राजर्षि के जादू से एक प्रख्यात वकील का देश सेवा की ओर उन्मुख होना, इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है।

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