टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

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मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने 31 मार्च 1972 को इस दुनिया से अलविदा कह दिया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि मीना कुमारी के अदाकारी के साथ एक शायर भी थीं। जब उनकी शायरी दुनिया के सामने आई तब लोगों को उनके इस हुनर का पता चला और उनके प्रशंसकों की दीवानगी बढ़ती चली गई। 1 अगस्त, 1932 को महज़बीन जो आगे चलकर मीना कुमारी के नाम से मशहूर हुईं, इस दुनिया में आयी थीं।

पिता की बेकारी और मां की लाचारी ने महज़बीन को अनाथालय की सीढ़ियों तक पहुंचा दिया, लेकिन मां-बाप तो मां-बाप होते हैं, बच्ची रोई तो गरीब पिता का मन भर आया और वापस दौड़कर बेटी को गले से लगा लिया और किसी तरह परवरिश की। ये परिस्थितियां मीना कुमारी के जीवन में लंबे समय तक बनी रहीं। और इस तरह की स्थितियां ही एक असाधारण अभिनेत्री के मन में कलमकारी की जिद पैदा कर ही थीं। उनकी कुछ शायरी देखिये-

आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता

हंसी थमी है इन आंखों में यूं नमी की तरह
चमक उठे हैं अंधेरे भी रौशनी की तरह

जैसे जागी हुई आंखों में, चुभें कांच के ख़्वाब
रात इस तरह, दीवानों की बसर होती है

नमी सी आंख में और होंठ भी भीगे हुए से हैं
ये भीगा-पन ही देखो मुस्कुराहट होती जाती है

तेरे क़दमों की आहट को ये दिल है ढूँढता हर दम
हर इक आवाज़ पर इक थरथराहट होती जाती है

हां, कोई और होगा तूने जो देखा होगा
हम नहीं आग से बच-बचके गुज़रने वाले

न इन्तज़ार, न आहट, न तमन्ना, न उमीद
ज़िन्दगी है कि यूं बेहिस हुई जाती है

कहीं कहीं कोई तारा कहीं कहीं जुगनू
जो मेरी रात थी वो आप का सवेरा है

ग़म ही दुश्मन है मेरा, ग़म ही को दिल ढूंढ़ता है
एक लम्हें की जुदाई भी अगर होती है

बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का खंडहर सजा कर
शायद इसी तरफ से एक दिन बहार गुज़रे

 

मीना कुमारी हिंदी सिनेमा की एक ऐसी अभिनेत्री थीं जिन्होंने अपनी कामयाबी का एक नायाब इतिहास रचा लेकिन उनकी जिंदगी काफी दर्द भरी रही जिसकी वजह से उन्हें ट्रेजिडी क्वीन भी कहा जाता था। नाम, इज्जत, शोहरत, काबिलीयत, रुपया, पैसा सभी कुछ मिला पर सच्चा प्यार नहीं। कहते हैं जो गम की तस्वीर मीना कुमारी बना सकती थी वह कोई और नहीं बना सकता था। लेकिन वो गम कहां से आया ये सिर्फ मीना कुमारी ही बता सकती थीं।

महज 38 की उम्र तक 100 फिल्में करने वाली मीना कुमारी इस दौर की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्री थीं। मीना कुमारी ने अपनी एक्टिंग के दम पर एक ऐसा इतिहास रचा जिसे भुला पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं हैं। महजबीं को असली पहचान साल 1952 में आई फिल्म ‘बैजू बावरा’ से मिली। इसी फिल्म के निर्देशक विजय भट्ट ने महजबीन बानो को एक नया नाम दिया और तब से वो मीना कुमारी के नाम से जानी जाने लगीं।

”टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, धज्जी-धज्जी रात मिली
जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौगात मिली

रिमझिम-रिमझिम बूँदों में, ज़हर भी है और अमृत भी
आँखें हँस दीं दिल रोया, यह अच्छी बरसात मिली

जब चाहा दिल को समझें, हँसने की आवाज़ सुनी
जैसे कोई कहता हो, ले फिर तुझको मात मिली

मातें कैसी घातें क्या, चलते रहना आठ पहर
दिल-सा साथी जब पाया, बेचैनी भी साथ मिली

होंठों तक आते आते, जाने कितने रूप भरे
जलती-बुझती आँखों में, सादा-सी जो बात मिली”