रेप के लिए लड़की को ज्यादा जिम्मेदार बताने वाले दोषी मुकेश की फांसी पर आज कोर्ट में तालियां बजी

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दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भया गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चारों आरोपियो को मिली फांसी की सजा को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा सेक्स और हिंसा की भूख के चलते बड़ी वारदात को अंजाम दिया, दोषी अपराध के प्रति आसक्त थे, जैसे अपराध हुआ, ऐसा लगता है अलग दुनिया की कहानी है,  घटना की रात नाबालिग समेत सभी दोषी बस में मौजूद थे, पुलिस की जांच और डीएनए से गुनाह साबित हुआ, जजों के फैसला सुनाने के बाद कोर्ट में तालियां बजीं|

कोर्ट ने कहा जिस बर्बरतापूर्ण तरीके से घटना को अंजाम दिया गया, उस लिहाज से हाईकोर्ट का फैसला सही था। रहम की गुंजाइश नहीं है। घटना समाज को हिला देने वाली थी। घटना को देखकर लगता है कि ये धरती की नहीं बल्कि किसी और ग्रह की है। घटना के बाद शॉक की सुनामी आ गई। दोषियों ने पीड़िता को बस से कुचलकर मारने की कोशिश भी की। बाद में सिंगापुर में इलाज के दौरान निर्भया की मौत हो गई। लोगों को तभी भरोसा आएगा जब इसी तरह से फैसला हो। घटना समाज को झकझोर देने वाली है।

पिछले साल बीबीसी की डॉक्युमेंट्री ‘इंडियाज डॉटर’ को दिए इंटरव्यू में दोषी मुकेश बोला था आप एक हाथ से ताली नहीं बजा सकते। कोई भी शरीफ लड़की रात में नौ बजे घर के बाहर नहीं घूमेगी। उस हालत में एक लड़की रेप के लिए लड़के से कहीं ज्यादा जिम्मेदार होती है। लड़के और लड़की एक नहीं हो सकते। घर का काम और घर में रहना लड़कियों का काम है, वे रात में बार, डिस्को कैसे जा सकती हैं? भद्दे कपड़े पहन कर गलत काम करती हैं। केवल 20 पर्सेंट लड़कियां ही अच्छी होती हैं।

मुकेश ने कहा था मैंने 15-20 मिनट गाड़ी चलाई थी। लाइटें बंद कर दी थीं बस की। मेरा भाई था मेन (मुख्य अपराधी), लड़के (दोस्त) को मारा। लड़की चिल्लाती रही- बचाओ, बचाओ। हम उसे मारपीट कर पीछे ले गए। हम आ-जा रहे थे… बारी-बारी से। लड़की विरोध नहीं करती तो उसकी जान नहीं जाती। यदि वह लड़की और उसका दोस्त बिना कुछ कहे ऐसा होने देते तो हमारा गैंग उन्हें मारता-पीटता नहीं। लड़की को घटना का विरोध नहीं करना चाहिए था। यदि वह विरोध नहीं करती तो हम घटना के बाद उसे उसके घर तक छोड़ते और केवल उसके दोस्त को ही मारते।