कुशवाहा के जुड़ने से कितनी बढ़ेगी महागठबंधन की ताकत, एनडीए को कितना नुकसान?

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बिहार में रालोसपा अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के गुरुवार को महागठबंधन का हिस्सा बनने के साथ ही बिहार की राजनीति जातियों की गोलबंदी के एक नए दौर में प्रवेश कर गई है। अब महागठबंधन काफी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है वहीं नीतीश कुमार के होते हुए भी बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए कमजोर दिख रहा है।

ऐसा मानने की कई वजहें हैं। जरा पीछे जाएं और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो बिहार में सोशल इंजीनियरिंग के माहिर लालू यादव और नीतीश कुमार से मुकाबला होते हुए बीजेपी ने 40 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की तो उसमें उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान का बड़ा योगदान था। इस गठबंधन के सहारे बीजेपी के पक्ष में अगड़ी जातियों+अति पिछड़ा+दलित गोलबंद हुआ था।

इसके बाद वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में जब लालू+नीतीश+कांग्रेस का महागठबंधन बना, तो बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग महागठबंधन के यादव+कुर्मी+मुसलमान के आगे कमजोर पड़ गई। अब वर्ष 2019 से पहले एक बार फिर वहां समीकरण बदल चुके हैं। नीतीश कुमार अब एक बार फिर एनडीए का हिस्सा हैं, पासवान भी साथ हैं लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में एनडीए का हिस्सा रहे जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा अब यूपीए के साथ आ चुके हैं।

यहां पर ध्यान रखना होगा कि नीतीश कुमार की ताकत कुर्मी-कोइरी वोटबैंक में उपेंद्र कुशवाहा बड़ी सेंध लगा चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा के विधायकों के भले ही एनडीए के साथ रहना ठीक समझा लेकिन उपेंद्र कुशवाहा अतिपिछड़ों में जिस कोइरी समाज की राजनीति कर रहे हैं वह मजबूती से गोलबंद हुआ है और उसका चेहरा उपेंद्र कुशवाहा ही है। पटना के प्रदर्शन में यह परखा जा चुका है।

यानी एनडीए के साथ अब अगड़े+पिछड़े+दलित का गठजोड़ है तो महागठबंधन के पास यादव+कुशवाहा+मुसलमान का गठजोड़ है। यानी जो ताकत लालू और नीतीश के मिलने से बनी थी कमोबेश वही फिर कुशवाहा के आरजेडी के साथ जाने से बन गई है। लोकसभा चुनावों में अभी 4 महीने से ज्यादा का वक्त है, इस दौरान अभी कई समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे लेकिन अभी जो स्थिति है उसमें एनडीए के मुकाबले महागठबंधन कहीं से कमजोर नहीं दिख रहा।