धर्मसंकट में फंसा कश्मीर

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जो लक्ष्य उड़ी के हमलावरों का था, वही लक्ष्य लेकर 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर पाक का कबायली हमला हुआ था। यह युद्ध आज 70 साल बाद भी चल रहा है। जब महाराजा हरि सिंह ने सशर्त विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और डकोटा जहाजों में भारतीय सैनिक श्रीनगर के कच्चे एयरपोर्ट पर उतरने लगे तो यह अंदाजा नहीं था कि एक कभी न समाप्त होने वाला अभियान प्रारंभ होने जा रहा है। 01 जनवरी 1949 को 14 महीने बाद युद्धविराम लागू होने तक हमने जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख को तो बचा लिया, लेकिन गिलगिट, बालटिस्तान और पश्चिमी पर्वतीय कश्मीर के इलाके जो आज पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) है, हमारे कब्जे से बाहर रहे। इस 78114 वर्ग किमी के इलाके में 65 लाख जनसंख्या निवास करती है। चूंकि हम कहते हैं कि कश्मीर भारत का अटूट अंग है इसलिए ये सब हमारे ही नागरिक हैं। हमारे पास पाकिस्तान से दोगुनी बड़ी सेना और संसाधन थे, फिर कैसा युद्धविराम? स्वयं हमारी सरकार के संयुक्त राष्ट्र में गुहार करने की वजह से युद्धविराम हुआ। जो इलाका पाकिस्तान के कब्जे में है वह क्षेत्रफल में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल से बड़ा और बंगाल के बराबर है। कल्पना करें कि उतना बड़ा पंजाब, राजस्थान का इलाका पाकिस्तान के कब्जे में चला गया होता तो भी क्या भारत युद्धविराम मान लेता? निश्चय ही संपूर्ण भूमि की वापसी तक युद्ध चलता, लेकिन कश्मीर के मामले में ऐसा नहीं हुआ। आखिर क्यों?

कश्मीर में हम अंतिम सांस तक नहीं लड़े। क्या तत्कालीन नेतृत्व को मालूम न था कि जब पंचायत बैठेगी तो पंचायती रिवाज के मुताबिक कश्मीर का एक हिस्सा गिव एंड टेक में हमें पाकिस्तान को देना पड़ेगा? नेताओं को पता था पर पता नहीं क्यों वे युद्धविराम पर सहमत हो गए। वह महान सेकुलर नेताओं का जमाना था फिर भी उन्होंने कश्मीर के लिए जान की बाजी नहीं लगाई। शायद हमारे नेताओं ने दिल की गहराइयों से कश्मीरी समाज को अपना अंग नहीं माना। अगर संपूर्ण कश्मीर जूझ कर वापस लिया गया होता तो कश्मीर के लोगों को कभी भी हमारी नीयत पर शक करने की कोई गुंजाइश न होती, क्योंकि तब न तो कोई पंचायत होती न ही कोई वार्ता। पाकिस्तान की कश्मीर मांग के पीछे जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत था जिसके मुताबिक हिंदू-मुसलमान दो अलग कौमें हैं और उनका सहअस्तित्व संभव नहीं। यही सिद्धांत पाकिस्तान अवधारणा का आधार बना। सिंधु क्षेत्र के चार राज्यों पर इस सिद्धांत की चादर चढ़ा कर पाकिस्तान बनाया गया है। फाइटिंग टु द एंड की लेखिका क्रिस्टीन फेयर के मुताबिक पाकिस्तान की सेना इस सिद्धांत की सबसे बड़ी रक्षक है। हम तो द्विराष्ट्रवाद के समर्थक नहीं हैं।

जब कश्मीर का विलय भारत में हुआ तो वार्ताओं की बाध्यताएं कहां से आ गईं? लोकतांत्रिक भारत का हिस्सा बनकर आम कश्मीरी को गर्व होता जैसा कि शेख अब्दुल्ला को आजादी के शुरुआती दिनों में हुआ था, लेकिन 70 साल से वार्ताओं की मेज पर लगातार रखे हुए कश्मीर को हमने कभी गर्व का अवसर नहीं दिया। कश्मीर खासकर घाटी के निवासी तो हमेशा अनिर्णय के शिकार ही रहेंगे कि पता नहीं वार्ताओं का क्या परिणाम हो? यह कह देना आसान है कि बातचीत से समाधान होगा। समाधान की बातें जब नई सरहदों में बदलेंगी तो फिर जाने किसको कहां से बांट देंगी। युद्धविराम और जनमत संग्रह के प्रस्ताव ने कश्मीर को स्थायी रूप से दुविधाग्रस्त कर दिया है। कश्मीर घाटी इसी धर्मसंकट की मानसिकता में जी रही है। वार्ताएं उन्हें भारत का नागरिक नहीं बनने दे रही हैं। वार्ताओं से आखिर क्या हासिल होना है? गत सरकारों का प्रिय विकल्प यह रहा है कि युद्धविराम रेखा को स्थायी अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लिया जाए। पाक अधिकृत कश्मीर का खाली कराया जाना कभी किसी वार्ता का एजेंडा रहा ही नहीं। अगर गैर-मुस्लिम जम्मू व लद्दाख को इस विवाद से बाहर कर दिया जाए तो मामला घाटी पर आकर टिकता है और पाक कभी भी मुस्लिम बहुल आबादी वाली घाटी की मांग से पीछे नहीं हटेगा। इसी सिंद्धात के तहत उसने कश्मीरी पंडितों को घाटी से बाहर किया। जब चीन से पराजय व जबरदस्त अमेरिकी दबाव की पृष्ठभूमि में भी 1963 की भारत-पाक वार्ताओं में कश्मीर का बंटवारा नहीं सोचा जा सका तो आज यह और भी संभव नहीं है। इसलिए जो भी वार्ताएं होंगी वे अर्थहीन और दिखावटी ही रहेंगी। जाहिर है कि समाधान वार्ताओं में नहीं, बल्कि बलूचिस्तान, सिंध में जग रही राष्ट्रवाद की अलख में है।

कश्मीर युद्ध के कुछ महीनों बाद ही कबायली नेपथ्य में चले गए थे और पाकिस्तानी सेना ने खुले रूप में मोर्चा संभाल लिया था। द्विराष्ट्रवाद की हार के लिए हमें इस युद्ध को जीतना जरूरी था। अगर हमने पंजाब, पूर्वी पाकिस्तान पर नए मोर्चे खोले होते तो पाकिस्तान को बाध्य होकर रक्षात्मक रुख अख्तियार करना पड़ता। अगर हमने 1947 में पूर्वी पाकिस्तान के सिर्फ चटगांव इलाके को कब्जे में ले लिया होता तो इसका जबरदस्त असर कश्मीर में पाकिस्तान की युद्धक्षमता पर पड़ता। हमारा लक्ष्य एक वर्ष में ही पूर्ण हो जाता। उस दौर की लिखी पुस्तकों, विश्लेषणों में बहुत खोजने पर भी इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि आखिर हमने पूर्वी पाकिस्तान का रणनीतिक इस्तेमाल क्यों नहीं किया? हमारे नेता न जाने किन नियमों से यह युद्ध लड़ रहे थे। इस असमाप्त युद्ध का आज भी जीता जाना उतना ही जरूरी है जितना जरूरी 1947 में था। रक्षात्मक पद्धतियों से और तारबाड़ से अपनी सीमाओं को खुद बांध कर यह युद्ध नहीं जीता जा सकेगा। इसके लिए तो आक्रामक तेवर की आवश्यकता होगी।

महाभारत युद्ध समाप्त होने पर एक पहाड़ी पर स्थापित बर्बरीक के मस्तक ने श्रीकृष्ण से प्रश्न किया, प्रभु! मैंने युद्ध को साक्षीभाव से देखा है। कृपया बताएं भीष्म, कर्ण, गुरु दोणाचार्य आदि अनेक महारथियों के विरुद्ध युद्ध की मर्यादाओं का पालन क्यों नहीं हुआ? कृष्ण ने कहा यदि मर्यादाओं का पालन होता तो द्रोण, भीष्म, कर्ण जैसे अजेय योद्धाओं को हराया जाना संभव न था और मुङो यह युद्ध 18 दिवस में ही समाप्त करना था। धर्म का लक्ष्य नियमों और मर्यादाओं से बड़ा होता है। अपनी सभ्यता के महान नायक और महानतम रणनीतिकार श्रीकृष्ण से कुछ तो शिक्षाएं ग्रहण की होतीं हमने।

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