जहरीले धुएं की मुसीबत

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दिल्ली पर धुंध (स्मॉग) छायी हुई है। दिवाली के अगले दिन से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और इसके आसपास के इलाकों के बाशिंदों को खुली धूप के दर्शन नहीं हुए। हर लिहाज से हालत पिछले साल से बदतर है, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा था कि दिल्ली में रहना एक ‘गैस चैंबर” में रहने जैसा है। इसी जुमले को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से मिलने के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शनिवार को दोहराया। पिछले साल न्यायपालिका की फटकार के बाद केजरीवाल सरकार ऑड-ईवन का फॉर्मूला लेकर आई थी, लेकिन उस फौरी उपाय से दिल्ली के प्रदूषण स्तर पर खास फर्क नहीं पड़ा। केजरीवाल के मुताबिक ताजा स्मॉग का कारण पंजाब और हरियाणा में जलाई जा रही खूंट (फसल के अवशेष) है। बताया गया है कि वहां लाखों टन धान की खूंट जलाई जा रही है, जिसका धुआं फैलते-फैलते इस पूरे इलाके पर छा गया है। असर है कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर सामान्य से तकरीबन 20 गुना ज्यादा हो गया है। फेंफड़े के रोगों अथवा सांस लेने में दिक्कत के कारण अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या एक चौथाई तक बढ़ गई है। 1,800 से ज्यादा स्कूल बंद करने पड़े हैं, जिनमें दस लाख से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं। यानी स्मॉग ने एक बहुत बड़े क्षेत्र में जन-जीवन को प्रभावित किया है।

मुद्दा है कि क्या ये हालत सिर्फ खूंट जलाने से पैदा हुई? खूंट जलाने की रवायत पुरानी है। दिवाली की आतिशबाजी भी नई नहीं है। इसीलिए फिलहाल बनी हालत का सारा दोष इन्हीं फौरी वजहों पर नहीं डाला जा सकता। दरअसल, सारा दोष पंजाब और हरियाणा के माथे मढ़ देना दिल्ली सरकार के लिए एक आसान बहाना हो सकता है। लेकिन यह कहीं अधिक अप्रिय यथार्थ से आंख चुराना होगा। ऐसा नजरिया रहा, तो कोई टिकाऊ हल निकलना कठिन है। यह हकीकत है कि राजधानी में वाहनों (खासकर डीजल वाहनों) की बढ़ती संख्या, कंस्ट्रक्शन स्थलों पर सीमेंट-रेत जैसी सामग्रियों को बेरोक खुले में रखने और कचरे को बिना उचित उपाय किए जलाने के जारी चलन ने विशाल और घनी आबादी वाले इस महानगर एवं इसके आसपास के पर्यावरण को बिगाड़ा है। जब वातावरण में लगातार ग्रीनहाउस गैसों की परत जम रही हो, तब दिवाली या खूंट जलने से आए धुएं से ऐसी गंभीर स्थिति का पैदा हो जाना लाजिमी है। इसलिए आवश्यकता समग्र समझ और चौतरफा उपायों की है। विभिन्न् राज्यों में खूंट जलाने से रोकने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के उपाय अवश्य किए जाने चाहिए। मगर राजधानी में डीजल वाहनों को नियंत्रित करना और कंस्ट्रक्शन कार्यों को अनुशासित करना भी उतना ही जरूरी है। उल्लेखनीय यह है कि ऐसी समस्या देश के अधिकांश महानगरों के आसपास गहरा रही है। अत: इस बारे में राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। ये जिम्मेदारी केंद्र की है|