दमदार है,विद्या बालन की ये कहानी

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फिल्म की कहानी विद्या सिन्हा (विद्या बालन) और उसकी बेटी मिनी की है जो एक छोटे से कस्बे में ख़ुशी के साथ रहते हैं और एक दूसरे के साथ बहुत सारा वक्त बिताते हैं। एक दिन जब कुछ लोग मिनी को किडनैप करके ले जाते हैं तो उसकी तलाश करते हुए विद्या का एक्सीडेंट हो जाता है और उसकी याददाश्त चली जाती है। साथ ही विद्या कोमा में चली जाती है। इसके बाद इंस्पेक्टर इंद्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) इस केस की जांच-पड़ताल करने लगता है तो इसके तार कुख्यात अपराधी दुर्गारानी सिंह (विद्या बालन) से जुड़ने लगते हैं। बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स आते हैं और अंततः एक बड़ा सस्पेंस सामने आता है|
फिल्म का डायरेक्शन कमाल का है और खास तौर से फिल्म की सिनेमेटोग्राफी आपको बांध के रखती है। सुजॉय घोष ने सिनेमेटोग्राफर तपन बासु के साथ बहुत ही अच्छे तरीके से काम निकाला है। वैसे, फिल्म में इंटरवल के बाद का हिस्सा थोड़ा और कसा जा सकता था क्योंकि सेकेंड हाफ मे धीरे-धीरे सस्पेंस सामने आता तो कहानी और ज्यादा दिलचस्प लगती। वहीं, क्लाइमैक्स प्रेडिक्टेबल सा दिखाई पड़ता है, जिसे और बेहतर किया जा सकता था।
विद्या बालन की परफॉर्मेन्स एक बार फिर से बहुत ही बेहतरीन रही है। एक मां और एक कुख्यात अपराधी, दोनों किरदारों को विद्या ने उम्दा तरह से निभाया है। वहीं, बेटी के किरदार में नाएशा खन्ना ने अच्छी एक्टिंग की है। अर्जुन रामपाल ने एक इंस्पेक्टर का किरदार काफी सहज तरीके से निभाया है। बाकी कलाकारों जैसे जुगल हंसराज, खारिज मुखर्जी, कौशिक सेन ने अच्छा काम किया है। सभी किरदारों का अहम योगदान है।फिल्म का म्यूजिक और बैकग्राउंड क्लिंटन सेरेजो ने दिया है, जो बहुत ही अच्छा है।विद्या बालन और फिल्म की कहानी के लिए एक बार जरूर थिएटर तक जा सकते हैं। बहुत अच्छा मैसेज भी सामने आता है, जिसे आप परिवार के साथ देखेंगे तो ज्यादा प्रभाव पड़ेगा|