ग्राउंड वॉटर में ज्यादा यूरेनियम होने की वजह से दिव्यांग हो रहे बच्चे

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एसवाईएल के पानी को लेकर इन दिनों हर पार्टी सड़कों पर है। दूसरी तरफ उन लोगों में खौफ और बढ़ गया है, जहां बहने वाली नहरों के हिस्से के पानी का बड़ा हिस्सा एसवाईएल के जरिए हरियाणा जाना है। ये इलाके हैं अबोहर और फाजिल्का।

फाजिल्का जिले में ही डिप्टी सीएम सुखबीर बादल का हलका जलालाबाद पड़ता है और हेल्थ मिनिस्टर सुरजीत ज्याणी का भी हलका फाजिल्का। जिले में कई ऐसे गांव हैं, जहां बच्चे ग्राउंड वॉटर में ज्यादा यूरेनियम होने की वजह से दिव्यांग ही पैदा हो रहे हैं। दूसरी ओर सरकार ने समस्या का कारण और हल तलाशने की बजाय इनके लिए स्पेशल स्कूल खोलने शुरू कर दिए हैं।

किक्कर खेड़ा में प्राइमरी स्कूल में ही बने स्पेशल बच्चों के स्कूल में एक भी बच्चा ऐसा नहीं, जिसकी आंखें खराब न हो चुकी हों। कई के कान पूरी तरह से विकसित नहीं हुए। कुछ के हाथ-पैर मुड़े हैं। गांव किक्कर खेड़ा में पानी का मुख्य स्रोत वाटर वर्क्स है, मगर इसका फिल्टर लंबे समय से खराब है। मजबूरन गांव के ज्यादातर लोगों को जमीनी पानी ही पीना पड़ रहा है।सरकारी स्कूलों के आंकड़ों के मुताबिक यहां पर 140 मानसिक और शारीरक विकलांग बच्चें हैं, आसपास के आलमगढ़, घल्लू और अन्य गांवों को मिला लिया जाए तो विकलांग बच्चों की संख्या का आंकड़ा बढ़ता जाता है। इनका बचपन गलियों में खेलने की बजाए रेंगकर गुजर रहा है। इनमें ऐसे परिवार भी शामिल हैं जिनके घरों में तीन-तीन बच्चे विकलांगता का शिकार हो चुके हैं।राजस्थान की सीमा से सटे पंजाब के जिला फाजिल्का में अबोहर के गांव कीकर खेड़ा और कंधवाला में ऐसे हालात हैं जहां बचपन विकलांगता से शुरू होता है, और जवानी मां-बाप के सहारे या गलियों में रेंगते हुए गुजरती है। अहम बात ये है कि डिप्टी सीएम सुखबीर बादल और सेहतमंत्री सुरजीत कुमार ज्यानी का विधानसभा हलका भी इसी जिले में है। इसके बावजूद इन गांवों की सार न तो सेहत विभाग ने ली ओर न ही सरकार ने। हालात ये हैं कि विकलांग बच्चों के सर्टीफिकेट तक नहीं बने हैं।पंजाब में अब कुछ इलाके ऐसे भी हैं, यहां पर नस्ले विकलांग पैदा हो रही हैं। मां की कोख में ही गंभीर बीमारियों की चपेट में आकर बच्चे मानसिक और शारीरिक विकलांगता का शिकार हो रहे हैं। गांव में ऐसे बच्चों की लगातार बढ़ रही संख्या के बाद अब महिलाएं बच्चों को जन्म देने से भी डरती हैं।
 ग्रामीणों के मुताबिक सरकार को गांव के हालात का पूरा अंदाजा है। मगर आज तक विकलांगता का कारण जांचने और इनके इलाज का कभी कोई प्रयास नहीं किया गया। यहां तक की विकलांगों को सर्टीफिकेट तक देने के लिए सर्वे नहीं हुआ। शिक्षा के नाम पर सरकारी स्कूल में स्पेशल चिल्डर्न के लिए अलग से क्लासेज जरूर शुरू करवा दी गई। इसमें अकेले कीकरखेड़ा के ही 45 के करीब विकलांग बच्चों का रजिस्ट्रेशन है। ऐसे स्कूल कंधवाला, आलमगढ़, घल्लू और अन्य गांवों में भी खुलने शुरू हो गए हैं।