गोमती रिवर फ्रंट में अरबों के घोटाले में आठ इंजीनियरों पर मुकदमा

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गोमती रिवर फ्रंट घोटाले में आखिरकार शासन के आदेश पर सोमवार को एफआइआर दर्ज करा दी गई। अधिशासी अभियंता शारदा नहर, लखनऊ खंड की तहरीर पर गोमती नगर थाने में आठ इंजीनियरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है। इनमें तीन सेवानिवृत्त हो चुके हैं। खास बात यह है कि करोड़ों के घोटाले में किसी भी नौकरशाह या सफेदपोश का नाम नहीं है।

इंस्पेक्टर गोमती नगर सुजीत कुमार दुबे के मुताबिक सभी आरोपितों के खिलाफ धोखाधड़ी, वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार अधिनियम के तहत एफआइआर दर्ज की गई है। पुलिस को तहरीर के साथ 74 पेज की जांच रिपोर्ट दी गई है।

गोमती रिवर फ्रंट घोटाले की न्यायिक जांच के लिए उच्च न्यायालय इलाहाबाद के सेवानिवृत्त न्यायधीश आलोक कुमार सिंह की अध्यक्षता में जांच समिति बनाई गई थी। समिति में विशेषज्ञ के रूप में इंजीनियरिंग एवं वित्त संकाय के प्रोफेसर शामिल थे। न्यायिक जांच समिति से तथ्यों के आधार पर जांच कर निष्कर्ष मांगा गया था। जांच समिति ने 15 मई को शासन को आख्या प्रस्तुत कर दी थी। जांच में गोमती रिवर फ्रंट परियोजना के क्रियान्वयन में विभिन्न अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।

इनके खिलाफ रिपोर्ट:
– गुलेश चंद्र, तत्कालीन मुख्य अभियंता (सेवानिवृत्त)
– एसएन शर्मा, तत्कालीन मुख्य अभियंता
– काजिम अली, तत्कालीन मुख्य अभियंता
– शिव मंगल यादव, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (सेवानिवृत्त)
– अखिल रमन, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता (सेवानिवृत्त)
– कमलेश्वर सिंह, तत्कालीन अधीक्षण अभियंता
– रूप सिंह यादव, तत्कालीन अधिशासी अभियंता/अधीक्षण अभियंता (सेवानिवृत्त)
– सुरेंद्र यादव, अधिशासी अभियंता

मामले की जांच कर रहे गोमती नगर थाने के इंस्पेक्टर का कहना है कि 74 पन्ने की न्यायिक जांच रिपोर्ट मिली है, जिसका अध्ययन किया जा रहा है। रिपोर्ट पढ़ने के बाद वरिष्ठ अधिकारियों और विधिक सलाहकारों से सुझाव लिया जाएगा। इसके आधार पर आरोपितों के खिलाफ अन्य धाराओं की बढ़ोतरी की संभावना है।

परियोजना में गड़बड़ी के लिए दोषी पाए जिन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है, उसमें किसी अफसर और नेता का नाम नहीं है। परियोजना की डिजाइन तैयार करने वाले आर्किटेक्ट का नाम भी तहरीर में नहीं है। इस परियोजना का खाका खींचने वाले एक आइएएस अधिकारी का नाम भी एफआइआर में नहीं है।

वर्ष 2014-15 में गोमती नदी चैनलाइजेशन परियोजना के लिए 656 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित की थी जो बढ़कर 1,513 करोड़ हो गई थी, जिसका 95 प्रतिशत हिस्सा खर्च होने के बावजूद परियोजना का 60 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ। इस परियोजना की जांच के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न्यायमूर्ति आलोक सिंह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी।

source-DJ