भैया के हाथ में सिर्फ चाबी और भाभी ही रह जाती : डिंपल यादव

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यूपी चुनाव के दो चरण बीत चुके हैं और अब कल रविवार को तीसरे चरण के मतदान की तैयारी है। पहले दो चरण और इस तीसरे चरण के बीच सपा की रणनीति में एक ख़ास बदलाव देखने को मिल रहा है। अखिलेश और उनकी पत्नी डिंपल दोनों ही अपने परिवार में चले की सियासत का उल्लेख कर अब भावनात्मक फायदा लेने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि अभी तक के दो चरणों में वे ऐसा करने से बचते रहे हैं। तो क्या उन्हें ‘यादव लैंड’ में अपने साथ भितरघात होने का डर है?

दरअसल गुरुवार को अखिलेश यादव ने अपनी एक रैली में यह साफ़ उल्लेख किया कि उनसे तो उनकी साइकिल छीनने की कोशिश की गयी, उन्हें उनके पिता से दूर करने की कोशिश की गयी और यहां तक कि सपा को भी तोड़ने की कोशिश हुई। उन्होंने कहा कि चुनाव में एक तरफ ऐसे लोग होते हैं जो अपने परिवार के लोगों को टिकट दिलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन एक तरफ वे थे जिन्हें उन्हीं की पार्टी से उन्हीं के परिवार से दूर किया जा रहा था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि एक बार तो उन्हें ही पार्टी से निकाल दिया गया। अखिलेश ने इन बातों का उल्लेखकर मतदाताओं को भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की।

इसके दूसरे दिन डिंपल यादव ने भी जनता के सामने अपने अकेले पड़े पति को वोट देने की अपील करते हुए कहा कि उनके साथ गहरी साजिशें हुई हैं। साजिश करने वालों ने यहां तक कहा कि ‘ऐसा करो कि अखिलेश के हाथ सिर्फ चाबी और भाभी रह जाए’। डिंपल ने कहा कि अगर उनके साथ जनता खड़ी नहीं होती तो वे अकेले पड़ जाते और शायद तबका नज़ारा कुछ और होता। यानि शायद पार्टी भी टूट जाती या खुद अखिलेश ही सपा से बाहर होते। अखिलेश और डिम्पल ने ये कहकर जनता को भावनात्मक रूप से खुद के साथ जोड़ने की ही कोशिश की है।

तो क्या अखिलेश को ये डर सता रहा है कि शिवपाल उनके साथ भितरघात कर सकते हैं।

देखने वाली बात ये है कि अखिलेश और डिम्पल के अलावा समाजवादी पार्टी का कोई बड़ा चेहरा उनके साथ नहीं है। शिवपाल तो अपने चुनाव क्षेत्र जसवंतनगर से बाहर ही नहीं निकले हैं। मुलायम ने खुद को शिवपाल के निर्वाचन क्षेत्र जसवंत नगर और छोटी बहू अपर्णा के निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ कैंट तक ही सीमित रखा है। इनके अलावा वे सपा का प्रचार करने कहीं नहीं गए अलबत्ता आरएलडी के एक प्रत्याशी को जीत का आशीर्वाद जरूर दे दिया। इससे कम से कम एक बात तो साफ़ हो ही जाती है कि मुलायम और शिवपाल अखिलेश के साथ नहीं हैं। ऐसे में भितरघात होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि अखिलेश और डिम्पल को भावनात्मक कार्ड खेलना पड़ा है।