महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन से मिले खतरनाक संकेत

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पहले गुजरात फिर हरियाणा और अब महाराष्ट्र में उभरे शासक वर्ग के आंदोलन ने जहां राज्य सरकार की नींद हराम कर दी है वहीं भारतीय लोकतंत्र की तमाम अवधारणाओं पर प्रश्न-चिह्न खड़ा कर दिया है। अगर गुजरात में पटेलों ने आरक्षण के लिए राज्य सरकार की चूलें हिला दीं तो हरियाणा में जाटों ने पूरे राज्य को युद्ध क्षेत्र में बदल दिया था। अब वही स्थिति महाराष्ट्र में है। यह जानते हुए कि मराठों ने जो मांगें की हैं उसमें सिर्फ कोपर्डी दुष्कर्म कांड पर कार्रवाई करने के अलावा कोई और मांग मानना असंभव है, कांग्रेस, राकांपा, भाजपा और शिव सेना समेत सारे दल इस आंदोलन के साथ खड़े हैं।
मौजूदा संवैधानिक ढांचे के भीतर न तो 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण संभव है और न ही मौजूदा स्थितियां संसद से 1989 में पारित अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार विरोधी कानून को खत्म करने की इजाजत देती हैं। जहां कांग्रेस-एनसीपी की तरफ से मराठों को दिए आरक्षण को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है वहीं बाबा साहेब आंबेडकर की 125वीं जयंती पर दलितों को न्याय दिलाने का संकल्प जताने वाले राजनीतिक दल कैसे उस कानून को खत्म करेंगे जो दलितों को कहीं राहत देता है। इसके बावजूद राजनीतिक दल मराठों की 22 प्रतिशत आबादी और उसका आक्रोश देखकर इतने घबरा गए हैं कि वे उन दलितों की ओर से मुंह मोड़ने लगे हैं, जिनकी आबादी महज 11 प्रतिशत है। राजनीतिक दल न्याय अन्याय और सही-गलत का आग्रह भी छोड़ बैठे हैं।
निश्चित तौर पर जिस दलित ने अहमदनगर जिले के कोपर्डी गांव में मराठा नाबालिग लड़की से दुष्कर्म और हत्या का अपराध किया उसे कानून के मुताबिक सजा मिलनी चाहिए। किंतु सारे दलित समुदाय को दोषी मानकर उसे मिले सुरक्षा के विशेषाधिकारों को छीनने की मांग गैर-वाजिब है। मराठा लंबे समय से शासक रहे हैं और उनकी सामाजिक हैसियत ऐसी कमजोर नहीं है कि उन पर अत्याचार की नियमित घटनाएं हों। आज जिस तरह से शासक वर्ग में विद्रोह की भावना उमड़ रही है वह पूरे लोकतंत्र के लिए घातक संकेत दे रही है। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को इस दिशा में काम करना होगा कि सामाजिक न्याय और विकास के जिस सिद्धांत पर हमारा लोकतंत्र चल रहा है उसका लाभ सबको मिले और उससे लगातार सामाजिक तनाव कम करने में मदद मिले।

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