केंद्र सरकार जजों की नियुक्ति में ढिलाई बरत रही : CJI

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देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने सरकार के हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों पर बैठने पर कड़ा रुख लेते हुए कहा कि सरकार नियुक्तियों को भरने और जजों को सुविधाएं देने में ढिलाई बरत रही है। पिछले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा पुनर्विचार के लिए भेजे गए 43 नामों को फिर से सरकार के पास भेज दिया था। सीजेआई ने इन्हीं सिफारिशों का हवाला दिया है|

सीजेआई ने कहा कि देश के 24 हाईकोर्टों में 500 रिक्तियां हैं और बिना जजों के कोर्ट रूम खाली पड़े हैं। उन्होंने कहा कि 121 नियुक्तियां की गई हैं, लेकिन अनेक न्यायाधिकरणों जैसे एएफटी, कंपीटीशन कमीशन आदि में अध्यक्ष ही नहीं हैं। ये पद खाली हैं और जब मैं अपने रिटायर हो गए साथियों को इन पदों पर आने के लिए कहता हूं तो मुझे यह जानकर पीड़ा होती है कि वे इसके लिए मना कर देते हैं। वे कहते हैं सरकार उन्हें आधारभूत सुविधाएं और बैठने के लिए सम्मानित स्थान तक नहीं देगी। जस्टिस ठाकुर सुप्रीम कोर्ट परिसर में शनिवार को विधि दिवस के मौक पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे|

जस्टिस ठाकुर ने कहा कि न्यायपालिका न्यायाधिकरणों के खिलाफ नहीं है क्योंकि इनसे कोर्ट का बोझ कम होता है लेकिन समस्या तब आती है जब इन्हें सुविधाएं नहीं मिलतीं। उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरणों में सुविधाओं का बहुत बड़ा मसला है। उन्होंने पिछले दिनों पीएम को इस बारे में पत्र लिखा था कि नियमों में संशोधन कर हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इन आयोगों का अध्यक्ष बनाने के योग्य बना दिया जाए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जज इनके लिए उपलब्ध नहीं है|

उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्तियों के लिए लाए गए कानून एनजेएसी को रद्द करने के बाद से शीर्ष अदालत और सरकार के बीच तकरार चल रही है। सरकार इस कानून को नियुक्ति की 20 वर्ष पुरानी कोलेजियम प्रणाली को बदलने के लिए लिए लाई थी जिसमें सरकार के भी दखल का प्रावधान था|

कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सरकार पर निुयक्तियों को लेकर किए गए प्रहार पर कहा कि वह सीजेआई के रूख से सहमत नहीं हैं। उनहोंने कहा कि सरकार हाइकोर्टों में 120 नियुक्तियां की हैं यह देश के न्यायिक इतिहास में सबसे ज्यादा नियुक्तियां करने का दूसरा का वाकया है। उन्होंने कहा कि सरकार सीजेआई का सर्वाेच्च सम्मान करती है लेकिन इस मामले में हम उनसे सम्मानपूर्वक असहमत हैं। इस वर्ष ही हमने 120 निुयक्तियां की हैं। यह दूसरा मौका है जब इतनी बउ़ी संख्या में नियुक्तियां की गईं। इससे पूर्व 2013 में 121 नियुक्तियां की गई थीं| उन्होंने बताया कि 1990 से लेकर अब तक हाईकोर्ट में औसतन 80 नियुक्तियां ही होती रही हैं। अधीनस्थ न्यायपालिका में पांच हजार रिक्तियां हैं जिसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं है। यह ऐसा मामला है जिसपर सिर्फ न्यायपालिका को ही ध्यान देना है।उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति के ज्ञापन (एमओपी) बनाने में विफल रहा है जबकि सरकार इसके लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एमओपी पर अब तक कोई फैसला नहीं लिया है जबकि इसका ड्राफ्ट अगस्त में भेज दिया गया था|