28 साल में टूटेगा गोरक्षपीठ का गोरखपुर सीट से नाता

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पूरे 28 साल बाद गोरखपुर संसदीय सीट का गोरक्षपीठ से नाता टूटेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार पांच बार से यहां से सांसद रहे और उनके पहले उनके गुरु सांसद होते रहे। मुख्यमंत्री बने रहने के लिए योगी को अपने पद की शपथ लेने के छह महीने के भीतर विधानसभा या विधानपरिषद में से किसी एक का सदन का सदस्य बनना होगा और उसके पहले लोकसभा से त्यागपत्र देना होगा।

वर्ष 1989 से गोरखपुर संसदीय सीट लगातार गोरक्षपीठ के पास रही। योगी आदित्यनाथ के गुरु ब्रहमलीन महंत अवेद्यनाथ लगातार तीन बार (1989, 91, 96) यहां से सांसद रहे। बढ़ती उम्र के कारण 1998 में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को मौका दिया। तबसे योगी लगातार पांच बार गोरखपुर से सांसद चुने गए। अपने चुनाव में वह जातीय समीकरणों को तोड़ते हैं और हर बार उन्हें पहले से अधिक वोट मिलते हैं।

मुख्यमंत्री बनने के बाद से समय-समय पर चर्चा होती रही है कि योगी किस विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। चुनाव का समय पास आने के साथ यह चर्चा और बढ़ रही है पर योगी के लिए असली चुनौती विधानसभा नहीं लोकसभा सीट होगी। मुख्यमंत्री के लिए विधानसभा चुनाव शायद उतनी कठिन परीक्षा न हो लेकिन, बड़ा प्रश्न यह है कि वह लोकसभा सीट पर अपना उत्तराधिकारी किसे बनाएंगे। जो भी उम्मीदवार तय होगा उसे गोरक्षपीठ के भरोसे के साथ उससे अच्छे समीकरणों पर भी फिट बैठना होगा।

माना जा रहा है कि योगी अपने संसदीय क्षेत्र के किसी विधानसभा क्षेत्र से ही चुनाव लड़ेंगे। कुछ मौकों पर वह इसका संकेत भी दे चुके हैं, पर सीट कौन सी होगी। वह कैंपियरगंज, गोरखपुर ग्रामीण या सहजनवा से चुनाव लड़ सकते हैं। सूत्रों के अनुसार राष्ट्रपति चुनाव की मतगणना के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद लोकसभा से त्यागपत्र दे सकते हैं।

सूत्रों के अनुसार 20 जुलाई के बाद कभी भी उनका इस्तीफा हो सकता है। ये दोनों नेता चुनाव लड़ेंगे जबकि उपमुख्यमंत्री डा. दिनेश शर्मा, परिवहन मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहसिन रजा विधानपरिषद जा सकते हैं।

source-DJ