ब्रिटेन की जरूरत

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ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे की भारत यात्रा को ब्रिटेन में भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ब्रिटेन का मीडिया जिस तरह से इस यात्रा के पहले से ही इसका कवरेज कर रहा है, वह बताता है कि इस यात्रा से काफी उम्मीद बांधी जा रही है। ब्रिटेन इस समय पिछले लगभग दो दशक के सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। वहां की जनता ने अपने देश को यूरोपीय संघ से अलग करने का फैसला ले लिया है, लगभग पूरी ब्रिटिश राजनीति में अब विकास के वैकल्पिक रास्ते तलाशने की बेचैनी दिखाई दे रही है।

ब्रिटेन को अगले दो साल में यह भी साबित करना है कि यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला महज क्षणिक और भावुकता भरा नहीं था और इसके पीछे एक पुख्ता आर्थिक तर्क है। और ठीक यहीं पर भारत ब्रिटेन के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। इस समय भारत दुनिया के उन चंद देशों में है, जहां आर्थिक विकास दर काफी अच्छी चल रही है और यह रुझान अगले काफी समय तक बने रहने की संभावना है। यहां तक कि चीन में भी विकास दर अब नीचे आने लगी है। ऐसे में, ब्रिटेन के लिए जरूरी है कि वह भारत के साथ आर्थिक साझेदारी करे और उसकी विकास दर में योगदान करते हुए अपने आर्थिक आधार को पुख्ता करे। ब्रिटेन को लगता है कि इससे न सिर्फ उसे फायदा मिलेगा, बल्कि ब्रिटेन में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

यह सोच भारत के लिए भी फायदे के दरवाजे खोलेगी और इसीलिए भारत और ब्रिटेन इस समय संयुक्त रूप से एक तकनीकी सम्मेलन कर रहे हैं। वैसे जब ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला किया था, तब यह माना गया था कि इससे भारत का नुकसान हो सकता है, क्योंकि भारतीय कंपनियों के लिए ब्रिटेन यूरोपीय संघ के देशों में निर्यात के आधार के रूप में काम करता है। लेकिन अब भारत दो साल बाद यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग हो जाने के बाद के दौर की तैयारी कर रहा है। ऐसे में, भारत के लिए ब्रिटेन के साथ अपने रिश्तों को नए समीकरण में ढालना जरूरी हो गया है, थेरेसा का यह दौरा उसे इसका अवसर दे रहा है। लेकिन दोनों देशों के बीच की कुछ समस्याएं इसके आगे की हैं।

भारत के लिए पिछले कुछ समय से ब्रिटेन की वीजा नीति परेशानी का कारण बनी हुई है। खासकर भारतीय छात्रों को प्रवेश देने के मामले में ब्रिटेन सख्त हुआ है, जिसके चलते वहां अध्ययन के लिए जाने वाले छात्रों की संख्या पिछले साल में आधी रह गई है। एक समय में वहां हर साल 40 हजार भारतीय विद्यार्थी पढ़ने के लिए जाते थे, अब यह संख्या घटकर 20 हजार से भी कम हो गई है। ब्रिटेन के विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों के लिए उच्च अध्ययन का सबसे बेहतर विकल्प माने जाते रहे हैं, लेकिन अब उनके लिए ये अवसर कम होते जा रहे हैं। इस मसले को ब्रिटेन की सरकार दूसरे ढंग से देखती है।उसका कहना है कि समस्या भारतीय छात्रों से नहीं है, उन छात्रों से है, जो अपना अध्ययन समाप्त हो जाने के बाद भी यहां से जाते नहीं और यहीं ठहर जाते हैं। ब्रिटेन ने भले ही यूरोपीय संघ से अलग होने का फैसला कर लिया हो, लेकिन इस समय पूरे यूरोप में विदेशी मूल के लोगों के प्रति संदेह का जो भाव बढ़ रहा है, ब्रिटेन भी उससे अछूता नहीं है। इसलिए थेरेसा मे ने सोमवार को नई दिल्ली में अपने वीजा नियमों को उदार बनाने की घोषणा तो की, लेकिन छात्रों को वीजा दिए जाने के मामले में ज्यादा नरमी नहीं दिखाई। कहा गया कि छात्रों के ब्रिटेन आने से आपत्ति नहीं, लेकिन उन्हें वापस जाना भी होगा। थेरेसा ने इसे गैर-कानूनी ढंग से वहां रहने वाले विदेशियों से भी जोड़ दिया। इस एक मसले को छोड़ दें, तो दोनों देश बाकी मोर्चों पर काफी नजदीक आए हैं|