बेतुका समर्थन

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जब केंद्र सरकार ने भ्रष्ट तरीके से जमा किए गए धन से निपटने के लिए पांच सौ और एक हजार के नोटों का चलन खत्म किया है और इससे भी सख्त उपाय अपनाने की बात हो रही है, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का काले धन को अर्थव्यवस्था का सहारा बताना हैरान करता है। इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र सरकार की ताजा पहल के बाद समूचे देश में आम नागरिकों को व्यापक असुविधा हो रही है और उन्हें अपने ही पैसे के लिए मोहताज होना पड़ा है। लेकिन परेशानी में पड़े लोगों के बरक्स केंद्र सरकार का निशाना शायद भ्रष्ट तरीके से हासिल किए गए धन को रखने वाले लोग थे। कहा जा सकता है कि इस कदम के पहले जितनी तैयारी की जरूरत थी, वह नहीं हुई और इसी का नतीजा है कि आज बड़ी तादाद में लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है, जो काले धन की व्यवस्था के शिकार हैं। मगर त्रस्त जनता की तकलीफों की हिमायत में क्या किसी ऐसी व्यवस्था को सही ठहराया जा सकता है, जो समूचे देश को घुन की तरह खाए जा रही है|

अखिलेश यादव ने अपनी बातों के समर्थन में कुछ ऐसे आर्थिक विशेषज्ञों के विचारों का हवाला दिया, जो मानते हैं कि काले धन की समांतर अर्थव्यवस्था के चलते वैश्विक आर्थिक मंदी का भारत में उतना असर महसूस नहीं हुआ। शायद इस बयान से पैदा होने वाले विवाद का अंदाजा उन्हें था, इसलिए उन्होंने अपने कालेधन के खिलाफ होने की बात भी कही। लेकिन एक सुर में कालेधन के खिलाफ होते हुए इसे अर्थव्यवस्था के सहारे के रूप में पेश करने की बात कैसे की जा सकती है! सवाल है कि अर्थव्यवस्था में कथित तौर पर मददगार जिस काले धन की वकालत की जाती है, उसका स्वरूप क्या है! आम नागरिकों की मेहनत और ईमानदारी की कमाई से अर्जित की गई जमा राशि और भ्रष्ट तरीके से हासिल किए धन में जमीन-आसमान का फर्क होता है। कहा जा सकता है कि मंदी के दौर में निश्चित रूप से निजी स्तर पर लोगों की बचत ने देश की अर्थव्यवस्था को सामान्य बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन वह मेहनत की कमाई थी, जो छोटी-छोटी बचतों की शक्ल में लोगों ने अपने पास रखी थी। ऐसे सभी लोगों की जमा राशि को काले धन जैसा मान लेने का क्या आधार हो सकता है|

अगर अखिलेश यादव मानते हैं कि मोदी सरकार ने नोटबंदी के फैसले से आम जनता को गहरी पीड़ा दी है, तो उसका राजनीतिक प्रतिकार क्या काला धन का बचाव हो सकता है? हाल ही में एक खबर आई, जिसके मुताबिक देश के पचासी हजार करोड़ रुपए सिर्फ सत्तावन ऐसे लोगों के पास फंसे हुए हैं, जिन्होंने कर्ज तो लिया लेकिन उसे चुकाया नहीं। इसके अलावा, हजारों करोड़ रुपए की कर चोरी करने वालों पर भी कार्रवाई नहीं किए जाने को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को लेकर विवाद बहुत पुराना रहा है। मगर सरकारों के लिए इस तरह के धन पर लगाम लगाना शायद ही कभी प्राथमिक विषय रहा। इसके बजाय आबादी के उस ज्यादातर हिस्से को केंद्र में रख कर काले धन पर काबू पाने के दावे किए जाते हैं, जो दरअसल भ्रष्ट तरीकों से जमा किए गए धन की व्यवस्था के चलते ही अपने बहुत सारे अधिकारों से वंचित रह जाती है|