तीन तलाक को अमान्य करार देना अल्लाह के निर्देशों का उल्लंघन होगा, सुप्रीम कोर्ट में एआईएमपीएलबी ने कहा

13
SHARE

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अगर तीन तलाक को अमान्य करार दिया जाता है तो यह अल्लाह के निर्देशों का उल्लंघन होगा. बोर्ड ने कहा कि तीन तलाक को नहीं मानना कुरान को दोबारा लिखने और मुस्लिमों से जबरदस्ती पाप कराने के लिए मजबूर करने जैसा होगा.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि मुसलमानों में प्रचलित तीन तलाक, निकाह हलाला और बहुविवाह की प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिकाएं विचारयोग्य नहीं हैं. साथ ही ये कोर्ट के दायरे में नहीं आते हैं. बोर्ड ने कहा कि इस्लामी कानून, जिसकी बुनियाद अनिवार्य तौर पर पवित्र कुरान एवं उस पर आधारित सूत्रों पर पड़ी है की वैधता संविधान के खास प्रावधानों पर परखी नहीं जा सकती है. इनकी संवैधानिक व्याख्या जब तक जरूरी न हो जाए, तब तक उसकी दिशा में आगे बढ़ने से न्यायिक संयम बरतने की जरूरत है.

बोर्ड ने कहा कि याचिकाओं में उठाये गए मुद्दे विधायी दायरे में आते हैं और चूंकि तलाक निजी मामला है इसलिए उसे मौलिक अधिकारों के तहत लाकर लागू नहीं किया जा सकता. बोर्ड ने दावा किया कि याचिकाएं गलत समझ के चलते दायर की गई हैं और यह चुनौती मुस्लिम पर्सनल कानून की गलत समझ पर आधारित है. बोर्ड का कहना है कि संविधान हर धार्मिक वर्ग को धर्म के मामलों में अपनी चीजें खुद संभालने की इजाजत देता है.

एआईएमपीएलबी ने शीर्ष अदालत में अपने लिखित हलफनामे में कहा, ‘शुरू में यह स्पष्ट किया जाता है कि वर्तमान याचिकाएं विचारयोग्य नहीं हैं क्योंकि याचिकाकर्ता निजी पक्षों के खिलाफ मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग करते हैं’. बोर्ड ने कहा, यह स्पष्ट किया जाता है कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता न्यायिक आदेश की मांग कर रहे हैं जो बिल्कुल अनुच्छेद 32 के दायरे के बाहर है. निजी अधिकारों को संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के तहत व्यक्तिगत नागरिकों के विरूद्ध लागू नहीं किया जा सकता.