मायावती के दांव से कांग्रेस सन्न, अखिलेश परेशान लेकिन शिवपाल और बीजेपी की खुशी का ठिकाना नहीं

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बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने बुधवार को ऐसा दांव खेला कि कांग्रेस को पसीने छूटने लगे और पार्टी के केंद्रीय नेता सफाई देते नजर आए कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी के साथ मायावती के अच्छे रिश्ते हैं। जाहिर है मायावती दहाड़ से कांग्रेस भीतर से हिल गई है, वरना मायावती के इतने तल्ख शब्दों के जवाब में टालमटोल नहीं बल्कि आक्रामक हमले किए जाते। उधर मायावती के इस कदम से बीजेपी और समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाने वाले शिवपाल सिंह यादव की बांछें खिल गई हैं।

मायावती मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस से तालमेल की सारी संभावनाओं को खत्म कर अलग रास्ता पकड़ चुकी हैं और आगे के लिए भी यानी 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए भी उन्होंने संकेत दे दिया है कि वह नहीं झुकने वाली, झुकना कांग्रेस को ही होगा। यानी 2019 के लिए सीटों पर समझौता करना है कि तो मायावती की शर्त पर ही होगा।

उत्तर प्रदेश में जिस महागठबंधन की कवायद चल रही है उसमें बसपा के अलावा समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आरएलडी को भी जोड़ने की बात है। इन सभी पार्टियों में बसपा और सपा की भूमिका सबसे मजबूत है, बिना इन दोनों के मिले कांग्रेस और आरएलडी कुछ नहीं कर सकते, यहां तक कि सपा-बसपा में से किसी एक के भी नहीं होने से इनकी बात नहीं बन पाएगी।

बुधवार के संदेश से मायावती ने साफ कर दिया है कि भले ही उनकी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में खाता नहीं खोल सकी, 2017 के विधानसभा चुनावों में सिमट कर 19 सीटों पर आ गई लेकिन उन्हें अपने वोटरों पर पूरा भरोसा है। 2014 और 2017 दोनों ही चुनावों में उनकी पार्टी को 21 फीसदी वोट मिले, ये ऐसा वोट बैंक है जिसे वो जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकती हैं, इसे ट्रांसफर भी करा सकती हैं, यूपी में हाल के उपचुनाव के नतीजे इसके गवाह हैं। इसीलिए जो उनसे गठबंधन करना चाहते हैं उन्हें उनकी माननी ही पड़ेगी।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव मायावती की ताकत को समझ चुके हैं, इसीलिए वह लगातार नरम होकर बोल रहे हैं लेकिन कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मायावती को तवज्जो न देकर बड़ी भूल कर दी है और अब इस पार्टी को उत्तर प्रदेश में इसका खामियाजा बड़े समझौते करके भुगतना होगा।

मायावती को साथ लेकर नहीं चल पाने से कांग्रेस को अब तक नुकसान ही हुआ है।  आंकड़ों पर गौर करें तो गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस करीब 20 सीटों पर बीजेपी से 2000 से कम वोटों के अंतर से हारी थी और इन सीटों पर बीएसपी को 2000 से ज्यादा वोट मिले थे। बीएसपी ने कर्नाटक में भी जेडीएस से समझौता करके कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया और आगे संभवत: छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी पहुंचाए।

कांग्रेस इन तीनों राज्यों में मजबूत है, इसीलिए वह इन राज्यों में मायावती को तवज्जो देने के लिए तैयार नहीं हुई लेकिन उसे नुकसान फिर भी उठाना पड़ सकता है। जब बात उत्तर प्रदेश की आएगी तो हालात इन राज्यों से उल्टे होंगे। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान में मजबूत कांग्रेस के पास खोने के लिए कम और पाने के लिए बहुत कुछ है। 2019 के चुनाव में मायावती के लिए उत्तर प्रदेश में यही स्थिति होगी कि सिर्फ पाना ही पाना है, जबकि कांग्रेस ने अपना रवैया नहीं बदला तो दो मौजूदा सीटें भी खोने का खतरा होगा।

मायावती के लिए एक स्थिति यह भी बनती है वह आगामी लोकसभा चुनाव के लिए शिवपाल सिंह यादव के समाजवादी सेक्युलर मोर्चा से गठबंधन कर लें। शिवपाल सिंह यादव ऐसा ही चाहते हैं, वह इसे कह भी चुके हैं और इस बात के लिए प्रयास भी कर भी रहे हैं। यह स्थिति बीजेपी के लिए भी फायदेमंद होगी क्योंकि तब तीन तरफा मुकाबले में वह ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने में फिर कामयाब हो जाएगी जैसा कि पिछली बार हुआ था, इसीलिए मायावती के बुधवार के कदम से इन दोनों पार्टियों के नेता काफी खुश हैं।

कांग्रेस और सपा की बजाय शिवपाल के मोर्च से मायावती की बसपा के गठबंधन की बात बनी तो भी मायावती फायदे में रहेंगी। उनकी पार्टी और शिवपाल की पार्टी कुछ सीटें जरूर जीत जाएंगी क्योंकि बसपा के कोर वोटबैंक के अलावा उम्मीदवारों का अपना वोटबैंक का फैक्टर वहां काम करेगा लेकिन ऐसा होने पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की तो नाव ही डूब जाएगी। ऐसे में मायावती ने तीन राज्यों में कांग्रेस को किनारे करके 2019 के लिए बहुत बड़ी चाल चल ही है जिसमें कांग्रेस को कदम-कदम पर समझौते करने होंगे।